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नेहरू के लिए आसान नहीं था दलाई लामा को शरण देना, हुई थी कड़ी आलोचना, 1962 के चीन युद्ध का कारण बना

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Dalai Lama’s great escape: मार्च 1959 में 14वें दलाई लामा तेनज़िन ग्यात्सो उस समय केवल 23 वर्ष के थे जब वे तिब्बत से भागकर भारत आए थे. छह जुलाई यानी रविवार को दलाई लामा का 90वां जन्मदिन है. उनकी यह चुनौतीपूर्ण यात्रा जो ल्हासा से शुरू हुई थी और जिसमें उन्होंने खुद को एक चीनी सैनिक के रूप में छिपाया था. अब तिब्बती बौद्ध इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. कहानी यह भी है कि कैसे भारत ने रणनीतिक चुनौतियों और चीन को नाराज करने के जोखिम के बावजूद तिब्बती आध्यात्मिक नेता और बौद्ध समुदाय को आश्रय दिया. यह तर्क दिया जा सकता है कि भारत द्वारा निर्वासित तिब्बतियों को शरण देने से 1962 के भारत-चीन युद्ध के तनाव में वृद्धि हुई होगी.

नेहरू सरकार के क्या थे विकल्प
नेहरू सरकार के सामने उस समय कई विकल्प थे. पहला विकल्प तो यही था कि दलाई लामा को शरण न दी जाए. यह चीन के साथ संबंधों को बेहतर बनाए रखने का एक तरीका हो सकता था. लेकिन यह भारत की मानवीय मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के खिलाफ होता. दूसरा, भारत दलाई लामा को शरण तो दे सकता था, लेकिन उन्हें राजनीतिक गतिविधियां चलाने से रोक सकता था. ताकि चीन को बहुत अधिक उत्तेजित न किया जा सके. तीसरा विकल्प था दलाई लामा और तिब्बती समुदाय को पूर्ण समर्थन देना. जैसा कि वास्तव में हुआ भारत ने दलाई लामा और उनके अनुयायियों को आश्रय और सहायता प्रदान की. जिससे वे भारत में अपनी संस्कृति और धर्म को बनाए रख सकें. यह एक साहसिक कदम था जिसके राजनीतिक और सैन्य परिणाम थे.

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26 अप्रैल, 1959 का दिन महत्वपूर्ण 
तिब्बत और भारत-चीन संबंधों के इतिहास में 26 अप्रैल, 1959 का दिन एक महत्वपूर्ण मोड़ था. चीन के आक्रमण के बाद अपनी मातृभूमि से भागकर आए दलाई लामा ने उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की. नेहरू ने घोषणा की कि तिब्बती बौद्धों के आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता को भारत में शांति से रहने की अनुमति दी जानी चाहिए. दलाई लामा के भारत आगमन के बाद नेहरू ने कहा था कि तिब्बती आध्यात्मिक नेता को बहुत कठिन यात्रा करनी पड़ी. प्रधानमंत्री ने कहा था, “यात्रा की परिस्थितियां दलाई लामा के लिए भी पीड़ादायक थीं. यह उचित ही है कि दलाई लामा को शांतिपूर्ण माहौल में अपने सहयोगियों से तिब्बत में हो रहे उतार-चढ़ाव पर परामर्श करने और मानसिक तनाव से उबरने का अवसर मिले.”

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राजनीतिक शरण देने का ऐलान
दलाई लामा की उस समय तक की यात्रा लंबी और कठिन थी. तिब्बत पर चीन के कब्जे और उसके बाद हुए हिंसक दमन के बाद दलाई लामा और कई अन्य तिब्बती भारत चले आए. दलाई लामा, उनके परिवार के सदस्यों, अंगरक्षकों और साथी तिब्बतियों को 31 मार्च, 1959 को अरुणाचल प्रदेश के खेंजीमाने दर्रे पर भारतीय सीमा रक्षकों ने स्वागत किया. भारत सरकार के अधिकारियों ने 2 अप्रैल, 1959 को चुतांगमू चौकी पर उनका औपचारिक स्वागत किया और उन्हें तवांग मठ ले गए. अगले दिन नेहरू सरकार ने घोषणा की कि उसने दलाई लामा को राजनीतिक शरण दी है. 

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कहा, वे अपनी मर्जी से भारत आए
दलाई लामा अंततः असम के तेजपुर चले गए. जहां उन्होंने भारतीय धरती से अपना पहला बयान जारी किया. 18 अप्रैल, 1959 को उन्होंने ल्हासा में अपने निवासों में से एक नोरबुलिंगका पैलेस पर एक महीने पहले की गई गोलाबारी के लिए चीन की आलोचना की. उन्होंने भारत सरकार के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त की और भारतीय जनता को उनके उदार स्वागत के लिए धन्यवाद दिया. उसी बयान में दलाई लामा ने उल्लेख किया कि वे अपनी मर्जी से भारत आए हैं किसी दबाव में नहीं. तेजपुर के बाद दलाई लामा कई महीनों तक मसूरी (अब उत्तराखंड में) में रहे. 1960 में सरकार के निमंत्रण पर वे धर्मशाला के मैकलियोडगंज चले गए और तब से वहीं हैं. यह शहर निर्वासन में तिब्बती सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया है.

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आसान नहीं था नेहरू के लिए ये फैसला
आज भले ही उस बात को 66 साल का लंबा अरसा बीत गया हो, लेकिन हकीकत यह है कि जवाहरलाल नेहरू के लिए भी दलाई लामा को शरण देना आसान नहीं था. इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नेहरू को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था. कई लोगों ने उन्हें चीन को नाराज करने के परिणामों के बारे में चेतावनी दी. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन ने एक महत्वपूर्ण कैबिनेट बैठक में दलाई लामा को शरण देने पर आपत्ति जताई थी. जिस दिन दलाई लामा ने तेजपुर से बयान जारी किया, उसी दिन चीन ने आधिकारिक तौर पर अपना विरोध दर्ज कराया. उसने भारत पर उसके आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाया. बीजिंग ने जोर देकर कहा कि दलाई लामा को वापस लौटाया जाए. इसने भविष्य में भारत-चीन संबंधों में गिरावट की नींव रखी और अंततः 1962 के चीन-भारत युद्ध का कारण बना.

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क्या कहा था जवाहरलाल नेहरू ने
हालांकि जवाहरलाल नेहरू ने दलाई लामा को भारत में प्रवेश की अनुमति देने और उन्हें राजनीतिक शरण देने के निर्णय के लिए ‘नैतिक और मानवीय’ आधार का हवाला दिया. अक्टूबर 1959 में, प्रधानमंत्री नेहरू ने संसद को बताया, “बहुत संभव है कि तिब्बती घटनाक्रम ने चीन की सरकार को नाराज कर दिया हो. बहुत संभव है शायद उन्होंने हमारे द्वारा किए गए काम यानी दलाई लामा को दी गई शरण पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की हो.” दलाई लामा के धर्मशाला में बसने के बाद यह शहर तिब्बती संस्कृति, धर्म और स्वतंत्रता आंदोलन का वैश्विक केंद्र बन गया. यहां केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (Central Tibetan Administration – CTA) और कई मठ, स्कूल और सांस्कृतिक संस्थान स्थापित किए गए. जिन्होंने निर्वासित तिब्बतियों को अपनी पहचान बनाए रखने में मदद की.

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1956 में क्या हुई थी चीन से बात
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक राजनीतिक शरण पाने से पहले दलाई लामा 1956 में भारत आए थे. वे बुद्ध के परिनिर्वाण की 2,500वीं वर्षगांठ के लिए भारत में थे. उनके साथ पंचेन लामा भी थे, जिन्हें तिब्बती बौद्ध संस्कृति में दलाई लामा के बाद दूसरे स्थान पर माना जाता है. उस समय उन्होंने तिब्बत की स्वायत्तता पर 1951 के समझौते की शर्तों से चीन के पीछे हटने के बाद तिब्बत की स्थितियों के बारे में नेहरू को बताया था. तब चीनी प्रधानमंत्री झोउ एनलाई भी नई दिल्ली में मौजूद थे और उन्होंने तिब्बत के बारे में नेहरू के साथ विस्तृत चर्चा की थी. उन्होंने नेहरू को आश्वासन दिया था कि बीजिंग तिब्बत की स्वायत्तता का सम्मान करेगा. इन आश्वासनों और नेहरू की सलाह पर ही दलाई लामा और पंचेन लामा दोनों देश लौट गए थे.

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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