बुंदेलखंड की तप्त धरा पर स्थित सिद्ध पीठ बागेश्वर धाम इस समय केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि उन 302 बेबस आंखों के सपनों की ‘लहर’ बन चुका है, जिनके जीवन में अभावों की अमावस्या थी। बागेश्वर पीठाधीश पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के संकल्प से उपजा यह ‘सप्तम कन्या विवाह महोत्सव’ अब एक वैश्विक उत्सव का रूप ले चुका है, जहाँ मानवता का श्रृंगार होने जा रहा है। महाराज श्री ने जब इस आयोजन की रूपरेखा साझा की, तो उनकी वाणी में उन अनाथ और निर्धन बेटियों के प्रति एक पिता की व्याकुलता और स्नेह साफ़ झलक रहा था।
इस वर्ष यह आयोजन सात समंदर पार की सरहदों को लांघकर अंतरराष्ट्रीय फलक पर अपनी चमक बिखेर रहा है। जब 15 फरवरी को इन बेटियों के हाथों में पिया के नाम की मेहंदी रचेगी, तब उस अलौकिक दृश्य के साक्षी बनने के लिए अमेरिका सहित आठ देशों के राजदूत और भारत के प्रखर संत-महापुरुष उपस्थित रहेंगे। यह उन बेटियों के लिए गर्व का क्षण होगा, जिन्होंने कभी सोचा भी न था कि उनके विवाह में दुनिया की बड़ी शक्तियां और अध्यात्म के शिखर पुरुष उन्हें ‘सौभाग्यवती’ होने का आशीष देने आएंगे। 13 फरवरी को हल्दी के मंगल उबटन से शुरू होने वाला यह सफर, 15 फरवरी को विदाई की उस बेला तक जाएगा, जहाँ समूचा धाम आंसुओं और मुस्कुराहटों के संगम में भीग जाएगा।
महाराज श्री का प्रेम केवल रस्मों तक सीमित नहीं है; उन्होंने इन बेटियों की नई गृहस्थी को किसी राजसी ठाट से कम नहीं सजाया है। उपहारों में दिए जा रहे श्री बालमुकुंद भगवान के विग्रह और रामचरितमानस जहाँ उनके घर को संस्कारित करेंगे, वहीं डबल बेड, सोफा, अलमारी, एलईडी टीवी और सिलाई मशीन जैसी गृहस्थी की हर छोटी-बड़ी वस्तु उनके जीवन की डगर को सुगम बनाएगी। सबसे भावुक कर देने वाली पहल 30 हजार रुपये की वह एफडी (FD) है, जो इन बेटियों के भविष्य की ढाल बनेगी। यह उपहार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक पिता का वह ‘स्त्रीधन’ है जो उन्हें ससुराल में स्वाभिमान के साथ सिर उठाकर जीने का संबल देगा।
इस महोत्सव की आत्मा उन 302 कन्याओं के दर्द में बसी है, जिन्हें समाज अक्सर उपेक्षित छोड़ देता है। इनमें 60 बेटियां वे हैं जिनके सिर पर न मां का आंचल है न पिता का साया, 8 बेटियां शारीरिक अक्षमताओं से जूझ रही हैं और 138 वे हैं जिनके पिता इस दुनिया से कूच कर चुके हैं। यहाँ जाति, संप्रदाय और सीमाओं की बेड़ियाँ टूटती नजर आती हैं। जब मध्य प्रदेश की गलियों के साथ-साथ नेपाल की घाटियों और उत्तर प्रदेश के गांवों की बेटियां एक ही मंडप के नीचे बैठेंगी, तो वह दृश्य ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की जीवंत तस्वीर पेश करेगा। 15 फरवरी को जब वैदिक ऋचाओं के बीच इन बेटियों की विदाई होगी, तो वह केवल एक विवाह की पूर्णता नहीं, बल्कि मानवता के विजय की घोषणा होगी।










