वो बेटियां जो कभी अपनी विदाई के खर्च को सोचकर सहम जाती थीं, आज उनके स्वागत में दुनिया के 8 देशों के राजदूत खड़े थे। आँखों में खुशी के आँसू और लबों पर बागेश्वर नाथ का नाम—305 जोड़ों ने जब एक साथ अग्नि के फेरे लिए, तो लगा मानो भगवान बालाजी स्वयं आशीर्वाद देने उतर आए हों। यह केवल विवाह नहीं, एक पिता के संकल्प की वो जीत है जिसने गरीबी को मात देकर मानवता का झंडा गाड़ दिया।
अरविन्द जैन/बुंदेलखंड समाचार छतरपुर। बुंदेलखंड की माटी में जब आस्था का सैलाब उमड़ा, तो दृश्य ऐसा था मानो साक्षात देवलोक धरती पर उतर आया हो। बागेश्वर धाम के सप्तम कन्या विवाह महोत्सव ने इस बार न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेवा और संकल्प की नई इबारत लिख दी है। 305 निर्धन बेटियों के पाणिग्रहण संस्कार का साक्षी बनने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ी, जहाँ जाति-पाति के बंधन टूटे और केवल ‘सनातन’ का स्वर गूँजा।
संतों का आशीष “व्यक्ति नहीं, समष्टि बनो” तुलसी पीठाधीश जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने नवदंपतियों को मंत्रमुग्ध कर देने वाला आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा, “विवाह केवल दो शरीरों का नहीं, बल्कि वैदिक संस्कारों का मिलन है।” वहीं, वात्सल्य मूर्ति दीदी मां ऋतम्भरा के शब्दों ने सबका दिल जीत लिया। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कार व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर समष्टि (संपूर्ण समाज) से जोड़ते हैं।
जब सात समंदर पार से आए ‘मामा-ताऊ’ इस बार का महोत्सव वैश्विक हो गया। अर्जेंटीना, चिली, पेरू, उरुग्वे, कोलंबिया, पनामा, सूरीनाम और पराग्वे जैसे 8 देशों के राजदूतों ने जब बेटियों के सिर पर हाथ रखा, तो लगा कि भारतीय संस्कृति ने पूरी दुनिया को एक परिवार (वसुधैव कुटुंबकम) बना लिया है। विदेशी मेहमानों ने कहा कि उन्होंने ऐसी आत्मीयता और व्यवस्था दुनिया में कहीं नहीं देखी।
भावुक क्षण “अब अनाथ नहीं, सनाथ हैं ये बेटियां” पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर महाराज) ने भरे गले से कहा, “आज से ये बेटियां गरीब नहीं रहीं, क्योंकि इनके सिर पर बागेश्वर नाथ का हाथ है।” महाराज श्री से लिपटकर जब दूल्हे और बेटियां फफक कर रो पड़े, तो वहां मौजूद लाखों लोगों की आंखें नम हो गईं। बेटियों का कहना था कि उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका विवाह किसी राजसी ठाठ-बाट से कम होगा।
महोत्सव की कुछ अनूठी झलकियां: डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने कहा कि महाराज श्री की उम्र छोटी है, लेकिन उनके संकल्प हिमालय से भी ऊंचे हैं। कीनिया से आए एक दंपत्ति ने अपनी शादी की 50वीं वर्षगांठ पर दो बेटियों का कन्यादान कर सेवा की अनूठी मिसाल पेश की। बुंदेली गायिका कविता शर्मा और ऋचा रिछारिया के विवाह गीतों ने पूरे पंडाल को लोक-संस्कृति के रंग में सराबोर कर दिया। बाल योगेश्वर महाराज ने खुद दामादों का तिलक कर उन्हें सम्मान दिया।
यह आयोजन केवल विवाह नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति है। जहाँ एक ओर दुनिया पैसों के घमंड में चूर है, वहीं बागेश्वर धाम से यह संदेश गया कि “पैसों का घमंड सिर पर नहीं, सेवा के लिए जमीन पर होना चाहिए।”