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छतरपुर में सिस्टम बनाम ‘ब्लैक कोट’: मान-मनौव्वल और गलतफहमी के बीच वकीलों का विद्रोह! सड़क पर अर्धनग्न होकर लेटे वकील, मोची को सौंपा ज्ञापन

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छतरपुर। शिवपुरी के करैरा में अधिवक्ता संजय सक्सेना की निर्मम हत्या के विरोध में सोमवार को छतरपुर की सड़कों पर एक ऐसा ‘हाई-वोल्टेज ड्रामा’ दिखा, जो विरले ही देखने को मिलता है। न्याय की रक्षा करने वाले अधिवक्ता जब खुद अर्धनग्न होकर सड़क पर लेटे, तो पूरे मध्य प्रदेश का ध्यान छतरपुर की ओर खिंच गया। यह विरोध प्रदर्शन तब और तीखा हो गया जब ‘कलेक्टर से ही मिलने’ की जिद और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच समन्वय की कमी ने इस आंदोलन को एक अनोखा मोड़ दे दिया।

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गलतफहमी या अफसरों की बेरुखी?
हकीकत और आक्रोश के बीच की तस्वीर यह रही कि जब अधिवक्ता ज्ञापन देने कलेक्ट्रेट पहुंचे, तब कलेक्टर जिला पंचायत सभागार में साप्ताहिक टीएल (TL) बैठक ले रहे थे। वकीलों का नेतृत्व कर रहे अध्यक्ष शिवप्रताप सिंह कलेक्टर से ही मिलने पर अड़े थे। प्रशासन की ओर से पहले तहसीलदार ऋतू सिंघई और फिर डिप्टी कलेक्टर पटेल ज्ञापन लेने पहुंचे, लेकिन वकीलों ने इनकार कर दिया। स्थिति बिगड़ती देख जिला पंचायत सीईओ नम:शिवाय अरजरिया भी बैठक छोड़कर आए, पर वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान पर था। चूंकि सारे अधिकारी कलेक्टर चैम्बर के बगल से निकलकर आ रहे थे तो अधिवक्ताओं को लगा कि कलेक्टर चैम्बर में होकर भी बाहर नहीं आ रहे, जबकि कलेक्टर पार्थ जैस्वाल दूसरे भवन (जिला पंचायत) में मीटिंग में थे। जब तक यह संचार की खाई पटती, नाराज अधिवक्ता कलेक्ट्रेट से निकलकर चौबे तिराहे पर जाम लगाने पहुंच चुके थे।

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कलेक्ट्रेट में ‘नो एंट्री’ और सड़क पर ‘सत्याग्रह’
वकीलों के गुस्से की मुख्य वजह कलेक्ट्रेट के गेट पर लगी पुलिसिया बैरिकेडिंग बनी। संघ के अध्यक्ष शिवप्रताप सिंह ने तीखे शब्दों में कहा, “क्या हम अपराधी हैं जो हमें बैरिकेड्स लगाकर रोका गया? हम शांतिपूर्ण तरीके से ज्ञापन देने आए थे, लेकिन हमें अपराधी जैसा महसूस कराया गया।” इसके बाद अधिवक्ता चौबे तिराहे पर अर्धनग्न होकर लेट गए और करीब दो घंटे तक शहर की रफ्तार थाम दी और आगे कहा कि जब न्याय के रक्षकों को ही सड़कों पर अर्धनग्न होकर लेटना पड़े और प्रशासन की अकड़ इतनी बढ़ जाए कि वह ज्ञापन लेने तक न आए, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था आईसीयू में है। जिला अधिवक्ता संघ का आक्रोश इस कदर था कि अधिवक्ताओं ने कलेक्टर का पुतला फूँकने की भी कोशिश की और मांग की कि ऐसे ‘अहंकारी’ अधिकारी को तुरंत बर्खास्त किया जाए। राज्य अधिवक्ता परिषद को इस संबंध में पत्र भी लिख दिया गया है ऐसा बताया…


अनोखा गांधीवादी तमाचा, मोची को सौंपा ज्ञापन
जब प्रशासन और वकीलों के बीच ‘ईगो’ और ‘मिसकम्युनिकेशन’ की दीवार ऊंची हो गई, तो अधिवक्ताओं ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने सबको चौंका दिया। कलेक्टर के आने का इंतजार खत्म कर उन्होंने छत्रसाल चौराहे पर जूता पॉलिश करने वाले एक मोची को अपना आधिकारिक ज्ञापन सौंप दिया। यह संदेश था कि अगर व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोग सुनने को तैयार नहीं, तो जनता का हर व्यक्ति उनके लिए ‘अधिकारी’ है।

प्रशासन की ओर से जिला पंचायत सीईओ नम:शिवाय अरजरिया ने सफाई देते हुए कहा कि पूर्व में अधिवक्ताओं द्वारा ऐसी कोई सूचना नहीं दी गई थी। जब अधिवक्ताओं के द्वारा यह कहा गया कि हमें सिर्फ कलेक्टर से ही मिलना है तब उन्हें विशिष्ट वर्ग मानते हुए मैं स्वयं वहां पहुंचा। ज्ञापन लेने के लिए प्रतिदिन एक अधिकारी की ड्यूटी लगाई जाती है लेकिन विशिष्ट समुदाय को देखते हुए मैं वहां स्वयं मौके पर पहुंचा लेकिन मुझे ज्ञापन नहीं दिया गया और फिर अधिवक्ताओं द्वारा जाम लगाया गया। जो लगभग दो से ढाई  घंटे बाद पब्लिक की सुविधा को देखते हुए यह जाम खोल दिया गया।
नमः शिवाय अरजरिया
जिला पंचायत सीईओ

Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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