छतरपुर। अपनी जादुई उंगलियों से हजारों चेहरों पर मुस्कान बिखेरने वाले और छतरपुर जिला अस्पताल की साख को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले प्रसिद्ध सर्जन डॉ. मनोज चौधरी ने एक बार फिर जिले का नाम पूरे प्रदेश में गौरवान्वित किया है। चिकित्सा के प्रति उनके समर्पण और सर्जरी के क्षेत्र में उनके अप्रतिम कौशल को देखते हुए इंदौर में आयोजित एक गरिमामय समारोह में उन्हें ‘एल.एम. पंत पुरस्कार’ से विभूषित किया गया है। गौरतलब हो जिले के डॉक्टर सुनील चौरसिया और डॉक्टर एसएस चौरसिया भी इस अवार्ड से सम्मानित हो चुके हैं..
सेवा की पराकाष्ठा
स्वास्थ्य विभाग ने इस वित्तीय वर्ष में जिले को 10 हजार एलटीटी (नसबंदी ऑपरेशन) का विशाल लक्ष्य सौंपा था। इस लक्ष्य की पूर्ति में डॉ. मनोज चौधरी ने एक ‘अकेले योद्धा’ की तरह मोर्चा संभाला। जिले में अब तक हुए कुल 8 हजार ऑपरेशनों में से 4,500 से अधिक सफल ऑपरेशन अकेले डॉ. चौधरी के हाथों संपन्न हुए, जिनमें 8 पुरुष नसबंदी भी शामिल हैं। यह मात्र एक संख्या नहीं है, बल्कि डॉ. साहब की कर्तव्यनिष्ठा और उनके प्रति जनता के अटूट विश्वास का जीवंत प्रमाण है।

’द एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इंडिया’ के स्टेट चैप्टर द्वारा आयोजित 43वें वार्षिक सम्मेलन में डॉ. मनोज चौधरी को इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया। जब स्टेट चेयरमैन डॉ. महिम, डॉ. सीपी कोठारी, डॉ. दिलीप और डॉ. राकेश शिवहरे जैसे चिकित्सा जगत के दिग्गजों ने उन्हें सम्मानित किया, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। यह पुरस्कार उन हाथों का सम्मान है जो दिन-रात मानवता की सेवा में बिना थके जुटे रहते हैं।
सेवा का पर्याय ‘सफेद कोट’
कहते हैं कि डॉक्टर धरती पर ईश्वर का रूप होता है, और डॉ. मनोज चौधरी ने अपनी कर्मठता से इस उक्ति को चरितार्थ किया है। जिला अस्पताल जैसी सीमित सुविधाओं के बीच इतने विशाल लक्ष्य को सफलतापूर्वक साध लेना किसी ‘साधना’ से कम नहीं है। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल स्वास्थ्य विभाग का मान बढ़ाया है, बल्कि छतरपुर के चिकित्सा इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय भी लिख दिया है।
गौरतलब हो डॉ. मनोज चौधरी केवल एक सर्जन नहीं, बल्कि कई परिवारों के लिए ‘संकटमोचक’ की भूमिका में भी नजर आते हैं। उनकी विशेषज्ञता का एक चमत्कारी पहलू यह भी है कि उन्होंने अब तक सैकड़ों ऐसे बच्चों की जान बचाई है, जिन्होंने अनजाने में सिक्के या अन्य बाहरी वस्तुएं निगल ली थीं जब बच्चे गले में सिक्का फंसने के कारण मौत और जिंदगी के बीच जूझ रहे होते हैं और परिजन बदहवास होकर अस्पताल पहुँचते हैं, तब डॉ. चौधरी अपनी अद्भुत एकाग्रता और सधे हुए हाथों से बिना किसी जटिल सर्जरी के उन सिक्कों को बाहर निकाल लेते हैं।










