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‘संविधान से समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता को हटाने का सुनहरा समय’ हिमंत बोले- इंदिरा गांधी ने बदला था प्रस्तावना

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हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 42वें संशोधन के माध्यम से दो शब्दों को जोड़कर संविधान को पूरी तरह से बदल दिया गया.

संविधान से समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता को हटाने का सुनहरा समय...- बोले हिमंत

हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि संविधान से समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता को हटाने का सुनहरा समय है.(Image:PTI)

गुवाहाटी. असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि संविधान से ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्दों को हटाने का यह ‘सुनहरा समय’ है. उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 42वें संशोधन के जरिए दो शब्दों को जोड़कर संविधान को पूरी तरह बदल दिया गया. सरमा ने कहा कि “आपातकाल के पचास साल बाद, चाहे वह आरएसएस हो या देश के कई बुद्धिजीवी, उन्होंने कहा है कि संविधान से समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शब्दों को हटाने का यह सुनहरा समय है. हम एक परिपक्व लोकतंत्र हैं… हमें ब्रिटिश या अमेरिकी संविधानों से धर्मनिरपेक्षता की शब्दावली अपनाने की ज़रूरत नहीं है; हम अपनी धर्मनिरपेक्षता भगवद गीता से लेंगे.

सेक्युलरिज्म संविधान के अनुच्छेद 14 में
हिमंत बिस्वा सरमा असम में ‘द इमरजेंसी डायरीज- इयर्स दैट फोर्ज्ड ए लीडर’ किताब के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे. यह किताब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आपातकाल विरोधी आंदोलन के दौरान के अनुभवों का संकलन है. सरमा ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा पहले से ही संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित है, जो सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देती है.

भारतीय धर्मनिरपेक्षता तटस्थ नहीं
उन्होंने कहा कि ‘हमारे संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि राज्य द्वारा देश में किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया जा सकता, यही हमारी धर्मनिरपेक्षता की नींव है. संविधान बनाते समय अंबेडकर ने कहा था कि संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द का उल्लेख करने का सवाल ही नहीं उठता. अनुच्छेद 14 में साफ तौर पर कहा गया है कि राज्य किसी के साथ भेदभाव नहीं कर सकता. यह धर्मनिरपेक्षता का सर्वोच्च स्तर है… प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द शामिल किए जाने के बाद, चाहे वह अदालतें हों या बुद्धिजीवी, उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को पश्चिमी चश्मे से देखना शुरू कर दिया. क्योंकि धर्मनिरपेक्षता शब्द की कल्पना भारतीय संदर्भ में नहीं की गई है… हम तटस्थ नहीं हैं… हम हिंदुओं के साथ हैं और हम मुसलमानों के साथ भी हैं. हमारे यहां धर्मनिरपेक्षता एक सकारात्मक अवधारणा है.’

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समाजवाद संघर्ष आधारित विचारधारा
उन्होंने यह भी कहा कि समाजवाद कभी भी भारतीय सभ्यता का हिस्सा नहीं रहा और न ही महात्मा गांधी द्वारा कहे गए ट्रस्टीशिप के आर्थिक आदर्शों का हिस्सा रहा. उन्होंने 1990 के दशक की शुरुआत में हुए आर्थिक सुधारों का जिक्र करते हुए कहा कि ‘हमारी सभ्यता में किसी भी नेता ने समाजवाद की बात नहीं की. यह संघर्ष पर आधारित विचारधारा है… इसकी वजह से हम दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए… संविधान में शामिल इस समाजवाद को भाजपा द्वारा खत्म नहीं किया जाना था. कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह के साथ मिलकर इसे खत्म किया और वे हमारी अर्थव्यवस्था में उदारीकरण लेकर आए… नरेंद्र मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी ने उदारीकरण के इस दर्शन को और आगे बढ़ाया.’

Rakesh Singh

Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. International affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in …और पढ़ें

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संविधान से समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता को हटाने का सुनहरा समय…- बोले हिमंत

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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