छतरपुर/ अंधेरों के बीच उम्मीद की एक किरण जब मुस्कुराहट बनकर घर लौटती है, तो वह दृश्य शब्दों से परे होता है। छतरपुर के निर्वाणा फाउंडेशन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि निस्वार्थ सेवा और समर्पण से खोई हुई खुशियों को वापस लाया जा सकता है। झारखंड के जमशेदपुर की गलियों से गुम हुई 28 वर्षीया ऋचा कुमारी, जो दो महीने से अपनों और खुद की सुध खो चुकी थी, आज इस संस्थान के भागीरथ प्रयासों से पुनः अपने परिवार की आगोश में है।
ऋचा की यह व्यथा केवल एक लापता युवती की कहानी नहीं, बल्कि नियति के थपेड़ों से टूटे एक मन की करुण पुकार थी। अपनी मां और भाई के असामयिक निधन के वज्रपात ने ऋचा को गहरे डिप्रेशन के उस गर्त में धकेल दिया था, जहां अपनों की पहचान भी धुंधली हो गई थी। 6 दिसंबर 2025 की वह सर्द सुबह, जब वह मात्र 50 रुपये लेकर घर की दहलीज लांघ गई थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि नियति उसे छतरपुर के इस सेवा-तीर्थ तक खींच लाएगी। भटकते हुए दमोह पहुंची ऋचा जब निर्वाणा फाउंडेशन लाई गई, तब वह केवल एक ‘लावारिस’ नाम थी, जिसका अतीत उसके अपने ही क्रोध और चिड़चिड़ेपन के पीछे छुपा हुआ था।
फाउंडेशन के संचालक संजय सिंह और उनकी टीम ने ऋचा को केवल आश्रय नहीं दिया, बल्कि एक परिवार की तरह उसे प्रेम और धैर्य की औषधि दी। कई दिनों की अथक देखभाल और मनोचिकित्सीय सुश्रुषा के बाद जब 15 जनवरी को उसके स्मृतियों के बंद द्वार खुले, तो जमशेदपुर का नाम जुबां पर आया। 30 जनवरी की वह तारीख इस कहानी का टर्निंग पॉइंट बनी, जब उसने लड़खड़ाते शब्दों में अपने घर का पता लिखा। संजय सिंह की तत्परता ने मीलों की दूरी को एक फोन कॉल में समेट दिया और वर्षों से गमगीन परिवार की सूनी आंखों में फिर से उम्मीद की ज्योति जगा दी।
जब जमशेदपुर से छतरपुर पहुंचे पिता और बहन ने अपनी ‘लाड़ली’ को सुरक्षित देखा, तो निर्वाणा फाउंडेशन का प्रांगण आंसुओं और दुआओं से भर उठा। पिता के कांपते होंठों से निकले शब्द— “बिटिया मिल गई, अब और क्या चाहिए”—संस्थान के हर सेवादार के लिए किसी बड़े पुरस्कार से कम नहीं थे। बहन गीता की सिसकियां इस बात की गवाह थीं कि निर्वाणा फाउंडेशन ने केवल एक युवती को नहीं, बल्कि एक बिखर चुके परिवार के विश्वास को बचाया है। समाज के इस निस्वार्थ सेवा भाव ने यह संदेश दिया है कि जहां इंसानियत जिंदा है, वहां कोई भी कभी ‘लावारिस’ नहीं हो सकता।










