नीता रैकवार
बकस्वाहा/छतरपुर: जिले के बकस्वाहा ब्लॉक का सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। करीब 108 गांवों की विशाल आबादी जिस अस्पताल पर टिकी है, वह वर्तमान में संसाधनों और स्टाफ के घोर अभाव से जूझ रहा है। शासन द्वारा स्वीकृत 21 पदों में से केवल चार नियमित कर्मचारी ही यहां पदस्थ हैं, जबकि बाकी पूरा केंद्र आउटसोर्स कर्मचारियों और महज दो डॉक्टरों के सहारे सांस ले रहा है। विडंबना यह है कि विशेषज्ञ डॉक्टरों के चारों पद खाली पड़े हैं और सामान्य चिकित्सकों के भी छह में से चार पद रिक्त हैं। ड्रेसर और कंपाउंडर जैसे अनिवार्य पदों पर वर्षों से नियुक्ति नहीं होने के कारण मरीजों को उचित प्राथमिक उपचार तक के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
जमीनी हकीकत यह है कि अस्पताल में मरीजों को डॉक्टर के इंतजार में घंटों बैठना पड़ता है। बेरखेरी से आईं अनीता जैसे दर्जनों ग्रामीण सुबह से अपनी बारी की राह ताकते रहते हैं। वहीं, अस्पताल की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मरीजों ने पर्ची और रेबीज इंजेक्शन के नाम पर अवैध वसूली के आरोप लगाए हैं, हालांकि बीएमओ डॉ. सत्यम असाटी और चिकित्सा अधिकारी डॉ. रावत ने इन शिकायतों पर सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है।
दवाओं का संकट भी कम नहीं है; अस्पताल में उपलब्धता न होने पर गरीब मरीजों को मजबूरी में महंगी दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। सबसे भयावह स्थिति एम्बुलेंस की है, जिसकी यहां कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। आपात स्थिति में एम्बुलेंस न मिलने से गंभीर मरीजों की जान पर बन आती है। यह बदहाल तस्वीर स्वास्थ्य विभाग के उन दावों की पोल खोलती है, जिनमें ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की बात कही जाती है।









