छतरपुर। प्रशासन का असली चेहरा तब सामने आता है जब वह किसी के दुख में मरहम की तरह काम करे। आज जिला पंचायत कार्यालय में यही मंजर दिखा, जहाँ प्रशासन की सकारात्मक सोमवार की सोच ने व्यवस्था की एक नई परिभाषा लिख दी। अक्सर सरकारी दफ्तरों की चौखटें फाइलों के बोझ और तारीखों के इंतज़ार के लिए जानी जाती हैं, लेकिन छतरपुर जिला प्रशासन ने इस धारणा को बदलकर सेवा के वास्तविक अर्थ को चरितार्थ किया है।
दुख की घड़ी में मिला संबल
सोमवार का सूरज प्रदीप कुमार राजपूत के लिए केवल एक नया दिन नहीं, बल्कि एक नई उम्मीद लेकर आया। प्रदीप के पिता, स्व. सुखदेव राजपूत (पूर्व ग्राम पंचायत सचिव), के निधन के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। श्रद्धा सुमन अभियान के तहत, प्रशासन ने केवल कागजी खानापूर्ति नहीं की, बल्कि दिवंगत सेवक के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उनके पुत्र को तत्काल अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार सौंपा।
नियत साफ तो नियम नहीं बनते बाधा*
जिला पंचायत सीईओ नमः शिवाय अरजरिया, जिनका नाम ही कल्याण का प्रतीक है, उन्होंने अपने कार्य व्यवहार से सिद्ध कर दिया कि यदि नियत साफ हो तो नियम कभी आड़े नहीं आते। उन्होंने स्वयं प्रदीप को ग्राम पंचायत ज्यौराहा (लवकुशनगर) में सचिव पद का नियुक्ति पत्र सौंपा। संवेदनशीलता की पराकाष्ठा तब दिखी जब सीईओ ने स्वयं प्रदीप से पूछा- कहीं नियुक्ति के लिए कोई पैसा तो नहीं लगा?
अनुकंपा नियुक्ति में प्रदेश की नजीर
जहाँ पद रिक्त न होने के कारण अक्सर नियुक्तियां वर्षों लटकी रहती हैं, वहीं कलेक्टर पार्थ जैसवाल के कुशल निर्देशन में छतरपुर प्रशासन ने पद रिक्त होते ही बिना समय गंवाए त्वरित कार्यवाही की। आज छतरपुर पूरे प्रदेश में अनुकंपा प्रकरणों के निराकरण में एक मॉडल बनकर उभरा है।
“प्रशासन की यह पहल है कि हर परेशान व्यक्ति जब कार्यालय आए, तो वह यहाँ से मुस्कुराता हुआ जाए। श्रद्धा सुमन केवल एक अभियान नहीं, बल्कि दिवंगत साथियों के परिवारों के प्रति हमारी कृतज्ञता है।”
नमः शिवाय अरजरिया, सीईओ जिला पंचायत









