राहुल जैन, बक्सवाहा | बकस्वाहा वन परिक्षेत्र के निवार अंतर्गत चौरई गांव में एक नीलगाय की मौत ने वन विभाग की साख और कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जहाँ ग्रामीण और किसान इसे ‘करंट लगाकर शिकार’ का मामला बता रहे हैं, वहीं वन विभाग इसे ‘प्राकृतिक मौत’ का जामा पहनाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। लेकिन, विभाग का यह सफेद झूठ तब बेनकाब हो गया जब खुद सरकारी डॉक्टर ने विभाग के दावों की हवा निकाल दी।

रेंज ऑफिसर का ‘झूठ’ और डॉक्टर का ‘सत्य’
वन परिक्षेत्र अधिकारी लव प्रताप सिंह ने बड़ी सफाई से बयान दिया कि नीलगाय की मौत प्राकृतिक है और उसका पोस्टमार्टम करा दिया गया है। लेकिन जब इसकी हकीकत जानने के लिए पशु चिकित्सक डॉ. ब्रजेश कुरकहे से बात की गई, तो उन्होंने चौंकाने वाला खुलासा किया। डॉक्टर ने स्पष्ट कहा— “हमें न तो कोई पत्र मिला और न ही हमारे स्टाफ ने किसी वन्य जीव का पोस्टमार्टम किया।” अब सवाल यह है कि यदि डॉक्टर ने पोस्टमार्टम नहीं किया, तो रेंजर साहब किस ‘कागजी रिपोर्ट’ के दम पर मौत को प्राकृतिक बता रहे हैं?
शिकारियों को ‘अभयदान’ या लापरवाही?
क्षेत्र में चर्चा है कि पूर्व रेंजर रामसिंह पटेल के 11 महीने के कार्यकाल में जहाँ 16 शिकारियों को जेल भेजा गया था, वहीं वर्तमान रेंजर के 2 साल के कार्यकाल में यह आंकड़ा महज 6 पर सिमट गया है। क्या बकस्वाहा के जंगलों में शिकार बंद हो गया है या फिर शिकारियों को विभागीय संरक्षण मिल रहा है? चौरई गांव के खैरऊ हार में मिली नीलगाय की लाश चीख-चीख कर कह रही है कि जंगल अब सुरक्षित नहीं हैं।
डीएफओ के संज्ञान में मामला, अब कार्यवाही का इंतजार
मामले की गंभीरता को देखते हुए डीएफओ रिसी मिश्रा ने कहा है कि मामला उनके संज्ञान में है और जांच के बाद दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की जाएगी। अब देखना यह है कि क्या डीएफओ साहब अपने मातहतों की इस ‘पर्दापोशी’ पर लगाम कसते हैं या फिर एक और बेजुबान की मौत फाइलों में दबकर रह जाएगी।










