छतरपुर बुदेलखंड के अडिग जननायक अमित भटनागर आखिरकार सलाखों से बाहर आ गए हैं। राजनगर न्यायालय से जमानत मिलने के बाद जेल की दहलीज पार करते ही भटनागर के तेवर और भी प्रखर और मारक नजर आए। उन्होंने दोटूक शब्दों में ऐलान किया कि विस्थापितों के हक की यह मशाल अब बुझेगी नहीं, बल्कि प्रशासनिक तानाशाही के विरुद्ध एक प्रलयंकारी अग्नि बनकर धधकेगी। मंगलवार का दिन राजनगर में भारी गहमागहमी और जन-आक्रोश का साक्षी रहा। वन विभाग की द्वेषपूर्ण कार्रवाई के बाद जब अमित भटनागर को मेडिकल परीक्षण के उपरांत न्यायालय में पेश किया गया, तो न्याय के मंदिर के बाहर हज़ारों आदिवासियों और किसानों का हुजूम अपने मसीहा की एक झलक पाने को बेताब दिखा। प्रथम श्रेणी सिविल न्यायाधीश मृदुल लटोरिया ने मामले की विसंगतियों और दलीलों को गहराई से सुनने के बाद देर शाम जब उनकी रिहाई के आदेश जारी किए, तो वह केवल एक व्यक्ति की जमानत नहीं, बल्कि विस्थापितों के संघर्ष की पहली बड़ी नैतिक जीत साबित हुई।
रिहा होते ही अमित भटनागर ने प्रशासन के विकास वाले नकाब को बेरहमी से उतारते हुए गंभीर भ्रष्टाचार की बखिया उधेड़ दी। उन्होंने सत्ता को सीधे निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया कि केन-बेतवा लिंक परियोजना की आड़ में हज़ारों हरे-भरे पेड़ों का कत्लेआम कर उनकी अवैध तस्करी का काला खेल खेला जा रहा है। इस महा-घोटाले और प्रशासनिक साठगांठ को जनता की नज़रों से छिपाने के लिए ही तंत्र बार-बार उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल की कालकोठरी में डालना चाहता है। भटनागर ने सरकारी फाइलों की वैधता पर कड़ा प्रहार करते हुए दावा किया कि विस्थापित गाँवों में आज तक एक भी वास्तविक ग्राम सभा आयोजित नहीं की गई है और कागजों पर दर्ज सारी सहमतियाँ पूरी तरह फर्जी और सत्ता के बंद कमरों में रची गई साज़िशें हैं।
किसानों के इस महासंग्राम को नई ऊर्जा देते हुए उन्होंने कांग्रेस पार्टी के सक्रिय सहयोग का आभार तो व्यक्त किया, लेकिन साथ ही एक बड़ी वैचारिक लकीर भी खींची। उन्होंने भाजपा और सपा सहित तमाम राजनैतिक दलों से भावुक अपील की कि वे अपनी दलगत सीमाओं को तोड़कर उन हज़ारों आदिवासियों के हक में खड़े हों, जिनकी पुश्तैनी ज़मीन और पहचान को परियोजना की बलि चढ़ाया जा रहा है। अमित भटनागर की यह रिहाई इस बात का साफ़ संदेश है कि सत्ता चाहे जितनी कँटीली तारें बिछा ले या मुकदमों का जाल बुन ले, लेकिन जल-जंगल-ज़मीन की रक्षा के संकल्प को डिगाना नामुमकिन है। यह लड़ाई अब महज़ मुआवजे की नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के स्वाभिमान और बेजुबानों की संवैधानिक गरिमा को बचाने की एक अखंड जंग बन चुकी है।










