छतरपुर | कहते हैं कि शासन केवल फाइलों और आदेशों से नहीं, बल्कि संवेदनाओं से चलता है। छतरपुर कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने अपनी कार्यशैली से इस बात को चरितार्थ कर दिखाया है। विगत एक सप्ताह में जिला प्रशासन ने न केवल आर्थिक सहायता के जरिए 18 परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाया है, बल्कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को हराकर लौटे एक कर्मवीर और एक दिवंगत कर्मचारी के लाचार बेटे को सम्मानजनक रोजगार देकर इंसानियत की नई मिसाल पेश की है।
कैंसर से जंग जीतकर लौटे ‘पहलवान’ को मिला कर्मक्षेत्र का सहारा
बेनीगंज मोहल्ला निवासी पहलवान अहिरवार, जो रेडक्रॉस सोसाइटी में वार्ड बॉय के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे, नियति के क्रूर प्रहार (जीभ के कैंसर) के कारण जीवन की जंग लड़ने चले गए थे। पांच दिन का अवकाश लेकर इलाज कराने गए पहलवान महीनों तक वापस नहीं लौट सके। लेकिन जब वे मौत को मात देकर वापस लौटे, तो उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा था।
कलेक्टर श्री जायसवाल ने यहाँ एक ‘मसीहा’ की भूमिका निभाई। उन्होंने पहलवान की बीमारी और संघर्ष को समझते हुए ‘नो वर्क नो पे’ के आधार पर उन्हें पुनः ज्वाइनिंग की स्वीकृति दी। यह निर्णय केवल एक नौकरी की बहाली नहीं, बल्कि एक विजेता का सम्मान है।
बबलू के आंसुओं को मिला प्रशासन का संबल
ऐसी ही एक और संवेदनशीलता बबलू बसोर के मामले में देखने को मिली। जिला चिकित्सालय में पदस्थ श्यामलाल बसोर की असामयिक मृत्यु के बाद उनका परिवार आर्थिक तंगी के भंवर में फंस गया था। घर के इकलौते सहारे बबलू ने जब अपनी व्यथा कलेक्टर के सम्मुख रखी, तो उन्होंने बिना विलंब किए मानवीय आधार पर बबलू को रेडक्रॉस में नियुक्ति की स्वीकृति दे दी। इन दो नियुक्तियों ने न केवल दो घरों के चूल्हे जलाए हैं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में जनता के विश्वास को और गहरा किया है।
18 परिवारों को मिला 4.51 लाख का संबल
कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने संवेदनशीलता का परिचय देते हुए दुर्घटनाओं और अन्य दु:खद कारणों से प्रभावित हुए 18 हितग्राहियों के लिए 4 लाख 51 हजार 950 रुपये की सहायता राशि स्वीकृत की है। संतोष प्रजापति, सरमन वाई, और राज कुमार रैकवार (जिन्हें सर्वाधिक 1.51 लाख की राशि मिली) सहित कई अन्य शोकाकुल परिवारों को यह सहायता प्रदान की गई है, ताकि वे इस कठिन समय में संभल सकें।









