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व्यक्ति को जीवन के उद्धार के लिए ब्रह्मनिष्ठ गुरु ही बनाना चाहिए, जो विरक्त हो, शास्त्रों का ज्ञाता हो, परमात्मा का भक्त हो, वह गुरु ही तुम्हारे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। ‘गुरु बनाओ जानकर, पानी पियो छानकर…।’ सच्चे गुरु भगवान की कृपा से ही
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एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने सोमवार को यह बात भागवत कथा के दूसरे दिन कही। गुरु पूर्णिमा महोत्सव के तहत मठ में यह कथा 20 जुलाई तक प्रतिदिन मध्याह्न 12 से शाम 4 बजे तक चलेगी।
परीक्षित को भागवत कथा से मिला मोक्ष का मार्ग
महाराजश्री ने बताया कि राजा परीक्षित ने कलियुग के प्रभाव के कारण जब ध्यान में बैठे शमीक ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया तो उनके पुत्र शृंगी ऋषि ने परीक्षित को श्राप दिया कि आज से सातवें दिन तुझे तक्षक नाग डंसेगा, जिससे तुम्हारी मृत्यु होगी। तुमने मरा हुआ सर्प मेरे पिता के गले में डालकर यह दुस्साहस किया है, उसका फल भुगतना होगा। रामचरित मानस में कहा गया है कि डारि नाग ऋषि कंठ में, नृप ने कीन्हों पाप। होनहार हो कर हुतो, ऋंगी दीन्हों शाप॥ राजा परीक्षित सूतजी के पास बैठे 88 हजार ऋषियों के पास पहुंचे। उनसे मुक्ति का मार्ग पूछा पर कोई भी मुक्ति का मार्ग बताने के लिए तैयार नहीं हुआ। तब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि आपने मां के गर्भ में मेरी ब्रह्मास्त्र से रक्षा की थी, अब आप ही मेरी रक्षा करो। तब भगवान श्रीकृष्ण ने शुकदेव को प्रेरित किया, तो शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को स्पर्श दीक्षा देकर भागवत कथा सुनाई और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया।
अहंकार के कारण स्वैच्छाचारी हो जाता है व्यक्ति
डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने बताया जीवात्मा परीक्षित ही है, क्योंकि मां के गर्भ में परमात्मा ही उसकी रक्षा करते हैं, पर वह संसार में आकर माया के वशीभूत होकर भगवान को छोड़कर संसार को अपना लेते हैं। भगवान की दी हुई वस्तुओं को अपना नहीं मानते। अहंकार के कारण स्वैच्छाचारी हो जाता है। विधि-नियमों को त्यागकर जो मन में आता है, वह करता है। इसी कारण दु:खी रहता है।
अपात्रों को गुरु बनाने से भला नहीं होगा
महाराजश्री ने कहा कि अज्ञानता के अभाव में व्यक्ति अपात्रों को ही गुरु बना लेता है। ‘गलियन, गलियन गुरु फिरे हमसे दीक्षा लेओ, नरक परो या सरग परो हमें रुपैया देओ…’अज्ञानता में कई लोग लोभियों को गुरु बना लेते हैं। ज्ञान भक्ति से उनका कोई लेना-देना नहीं रहता, केवल लालच बना रहता है। ‘लोभी गुरु लालची चेला, होय नरक में ठेलमठेला…’ दोनों ही नरकगामी हो जाते हैं। परमात्मा को अनुभव नहीं कर पाते, मिथ्या जगत को ही सच मान लेते हैं। स्वयं संत बनोगे, तो ही तुम्हें संत मिलेंगे…क्योंकि संत ही संत को पहचान सकता है, भक्त ही भक्त को पहचान सकता है। पूर्व जन्मों के पुण्य उदय होने पर ही सुयोग्य गुरु मिलते हैं। सच्चे गुरु तुम्हारे अंदर बसे काम, क्रोध, मोह, लोभ रूपी राक्षसों को अपने सद्विचार, लोक-परलोक का ज्ञान कराकर मार देते हैं और तुम्हें परमात्मा के स्वरूप का अनुभव कराकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं।
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