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अपनी संतान के दीर्घायु होने और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना को लेकर महिलाएं संतान सप्तमी का व्रत करती हैं। इस व्रत को दुबड़ी साते और मुक्ता भरण सप्तमी भी कहते हैं। यह व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को किया जाता है। इस बार यह व्रत 10 सितंबर क
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एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में सोमवार को यह बात कही।
कहानी सुनकर किया जाता है ठंडा भोजन
डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने बताया कि घर की बहुएं भीगा हुआ बाजरा का बायना निकालकर सास के पांव छूकर उन्हें देती हैं। कहानी सुनकर ठंडा भोजन करती हैं। जिसकी पुत्री का विवाह उसी वर्ष होता है तो उसे भी उजमन करना चाहिए अर्थात उसका व्रत रखना शुरू करवाना चाहिए। इसमें मोठ, बाजरे के 13 टुकड़े करके उसके ऊपर एक साड़ी-ब्लाउज रखकर दक्षिणा सहित सास को उसके पैर छूकर देते हैं।यह है कहानीमहाराजश्री ने कहानी सुनाते हुए कहा कि ऐसा बताया जाता है कि एक साहूकार के सात बेटे थे। वह जिसका भी विवाह करता, वह मर जाता था। इस तरह उसके छह बेटे मृत्यु को प्राप्त हो गए थे। जब बचे हुए सातवें पुत्र की शादी का समय आया तो उसकी बुआ को बुलाया गया। बुआ को रास्ते में एक बुढ़िया मिली। उससे पूछा- कहां जा रही हो, तो वह बोली भतीजे के विवाह में। लेकिन दु:ख की बात है कि मेरे छह भतीजे, विवाह होते ही परलोक गमन कर गए। यह सातवां है। यह सुनते ही बुढ़िया बोली, वह तो घर से निकलते ही दबकर मर जाएगा। बचा तो ससुराल के दरवाजे पर गिरने से मर जाएगा, नहीं तो सर्प काटने से मर जाएगा। बुआ ने बचने का उपाय पूछा तो बुढ़िया ने कहा- उपाय तो है, पर कठिन है। बुआ ने कहा उपाय बताओ मैं करूंगी। उसने कहा- लड़के को पेड़ के नीचे मत बिठाना। ससुराल में पीछे के दरवाजे से ले जाना। भंवर के समय कच्चे करवे में कच्चा दूध रखना, जब सर्प आए तो एक गर्म लकड़ी से उसे दाग देना। बाद में सांपिन आएगी। सांप को मांगेगी। तब तुम इससे अपने छह भजीते मांग लेना। वह उन्हें जीवित कर देगी। तब उसे सांप दे देना। बुढ़िया बोली- ध्यान रहे, इस बात को किसी को नहीं बताना, नहीं तो सुनने वाला मर जाएगा। बुआ घर गई। बुआ ने भतीजे को पीछे के दरवाजे से निकाला। निकलते ही मुख्य दरवाजा गिर गया। बुआ ने कहा मैं भी बारात में जाऊंगी। सबके मना करने पर भी जिद करके चली गई। बारात रास्ते में पेड़ के नीचे रुकने लगी, तो बुआ ने दूल्हे को धूप में ले जाकर बैठा दिया। दूल्हे के बैठते ही पेड़ गिर गया। सब जगह बुआ की प्रशंसा हुई। बुढ़िया ने जो-जो बताया था, सब बुआ ने किया। बारात के घर वापस आने पर बुआ ने सप्तमी के दिन दुबड़ी (बुढ़िया) की पूजा की। इसी कारण से इसे दुबड़ी साते कहते हैं। व्रत में कामना की जाती है कि दुबड़ी मैया ने जैसे बुआ के सातों भतीजे दिए वैसे ही सबकी संतानों की रक्षा करना। संतानों की रक्षा हेतु किए गए व्रत के कारण इसे संतान सप्तमी भी कहते हैं।
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