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हार गया संघर्ष, जीत गई मौत—विदा इंजीनियर राजाराम! एयर एंबुलेंस से AIIMS तक का सफर, डॉक्टरों और समाजसेवियों की मेहनत भी न आई काम

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छतरपुर | कहते हैं मौत और जिंदगी ईश्वर के हाथ में है, लेकिन जब कोई होनहार युवा मात्र 26 साल की उम्र में दुनिया छोड़ जाए, तो कलेजा मुंह को आ जाता है। ग्राम घूर चितहरी निवासी इंजीनियर राजाराम विश्वकर्मा की असमय मौत ने आज पूरे छतरपुर जिले को शोक की लहर में डुबो दिया है। दो साल तक आंतों के संक्रमण से जूझते हुए राजाराम ने अंतिम सांस तक संघर्ष किया, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था।

जब डॉक्टरों और समाजसेवियों ने झोंक दी ताकत
राजाराम की इस लंबी लड़ाई में छतरपुर के समाजसेवी और चिकित्सकों ने जो भूमिका निभाई, वह मिसाल है। जब ग्वालियर में इलाज के बाद परिवार की आर्थिक कमर टूट गई, तब समाजसेवी हरि अग्रवाल देवदूत बनकर सामने आए। उनके प्रयासों से छतरपुर के वरिष्ठ चिकित्सकों— डॉ. मनोज चौधरी, डॉ. नंदकिशोर जाटव, डॉ. बद्री पटेल और डॉ. आशीष शुक्ला ने एक साल तक राजाराम को बचाने के लिए अपनी पूरी चिकित्सा शक्ति झोंक दी। इन डॉक्टरों के लिए राजाराम महज एक मरीज नहीं, बल्कि एक बेटे जैसा बन गया था। यही वजह है कि उनकी मृत्यु पर आज ये चिकित्सक भी उतने ही दुखी हैं, जितना उनका अपना परिवार।

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कलेक्टर की पहल और एयर एंबुलेंस का वो सफर
राजाराम को बचाने के लिए प्रशासन ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। कलेक्टर छतरपुर की संवेदनशीलता और हरि अग्रवाल की सक्रियता से राजाराम को 29 नवंबर 2025 को एयर एम्बुलेंस के जरिए भोपाल एम्स भेजा गया था। दो महीने तक एम्स के विशेषज्ञ उनका इलाज करते रहे, लेकिन 26-27 जनवरी की दरम्यानी रात राजाराम ने इस नश्वर संसार को सदा के लिए विदा कह दिया।

अश्रुपूरित अंतिम विदाई
मंगलवार को राजाराम का पार्थिव शरीर भोपाल से उनके गृहग्राम चितहरी पहुंचा। अंतिम संस्कार में उमड़े जनसैलाब की हर आंख नम थी। समाजसेवी हरि अग्रवाल और निजी एंबुलेंस मालिक रामप्रकाश द्विवेदी ने खुद गांव पहुंचकर राजाराम को श्रद्धांजलि दी और शोकाकुल परिवार को ढांढस बंधाया।

बुन्देलखण्ड समाचार परिवार भी इस दुख की घड़ी में ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति और शोकाकुल परिवार को यह वज्रपात सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करता है।

Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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