छतरपुर। कहते हैं कि विधाता हर जगह नहीं हो सकता, इसलिए उसने माँ बनाई। लेकिन एक माँ केवल जन्मदात्री नहीं, बल्कि वह शिल्पकार भी होती है जो अपने संस्कारों की छैनी से बच्चे के भविष्य को गढ़ती है। इस मदर्स डे पर एक ऐसी ही अनुपम कहानी छतरपुर से सामने आई है, जहाँ जिला पंचायत सीईओ नमः शिवाय अरजरिया की सफलता के पीछे उनकी माँ का अदम्य संघर्ष, मूक त्याग और अटूट संस्कार खड़े नजर आते हैं।
दतिया जिले के छोटे से गाँव कामद के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे नमः शिवाय का बचपन अभावों के बीच, लेकिन संस्कारों की छांव में बीता। जब परिवार खेतों में पसीना बहाकर आजीविका जुटा रहा था, तब उनकी माँ ने एक मौन तपस्या शुरू की। वह तपस्या थी—अपने बच्चों को शिक्षा और नैतिकता के उस शिखर पर पहुँचाने की, जहाँ अभाव कभी बाधा न बन सकें।
हैरान करने वाली बात यह है कि आज जिले की प्रशासनिक कमान संभालने वाले नमः शिवाय ने प्राथमिक शिक्षा के दौरान कभी स्कूल की दहलीज तक नहीं लांघी। वह सीधे पाँचवीं कक्षा में स्कूल पहुँचे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि उनकी शिक्षा रुकी रही। उनकी माँ ने घर को ही पाठशाला बना दिया था। उन्होंने बचपन में ही बेटे के हाथों में रामचरितमानस थमा दी। मानस की उन चौपाइयों ने न केवल उन्हें भाषा सिखाई, बल्कि जीवन की चुनौतियों से लड़ने का धैर्य और लोक-कल्याण का संस्कार भी दिया।
आज प्रशासनिक व्यस्तताओं और फाइलों के अंबार के बीच भी नमः शिवाय अरजरिया अपनी सफलता का सारा श्रेय अपनी माँ के चरणों में अर्पित करते हैं। उनका कहना है— माँ ने सिर्फ मेरा पालन-पोषण नहीं किया, बल्कि मुझे संघर्षों से टकराने का साहस दिया। आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह माँ की दी हुई सीख और उनके अनुशासन का प्रतिबिंब मात्र है। खेतों की पगडंडियों से शुरू हुआ यह सफर आज छतरपुर के शीर्ष पद तक पहुँच चुका है, जो यह साबित करता है कि यदि माँ के संस्कार और बेटे का संकल्प मिल जाए, तो नियति को भी नतमस्तक होना पड़ता है।









