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बुढ़ापे में धमाल! ये दादा-दादी घर बैठे हर महीने कमाते हैं 50 हजार, जानिए कैसे

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सूरत की गलियों में जब 64 साल की शारदाबेन और 67 साल के रूपसिंह वाघेला अपनी आरी कढ़ाई से बनी चीज़ों को बेचते हैं, तो लोग न सिर्फ उनकी कला की तारीफ करते हैं, बल्कि उनके हौसले को भी सलाम करते हैं. उम्र बढ़ने के साथ अक्सर शरीर थकने लगता है और हाथ-पैर कांपते हैं, लेकिन वाघेला दंपत्ति की मेहनत और लगन इस सोच को पूरी तरह बदल देती है.

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सेवानिवृत्ति नहीं, दूसरा जन्म है यह
रूपसिंहभाई पहले हीरा उद्योग में काम करते थे और शारदाबेन घरेलू जिम्मेदारियों में व्यस्त थीं. लेकिन जब काम से फुर्सत मिली, तब उन्होंने अपनी पुश्तैनी कला—आरी कढ़ाई—को फिर से जीना शुरू किया. उन्होंने न सिर्फ इस काम को अपनाया, बल्कि इसे घर बैठे ऐसा कारोबार बना दिया जिससे हर महीने ₹50,000 तक की आमदनी होने लगी.

बचपन से जुड़ी विरासत, अब बनी कमाई का जरिया
शारदाबेन बताती हैं कि यह काम उन्होंने 10 साल की उम्र में अपने माता-पिता से सीखा था. “हम वाघेला समुदाय से हैं और यह काम हमारे खून में है. पहले दूसरों के लिए कढ़ाई करते थे, लेकिन अब हमने खुद का काम शुरू किया है. तकिए के कवर, पर्स, तोरण, मोबाइल कवर, और चादरें बनाते हैं और लोग इसे खूब पसंद करते हैं.”

पति-पत्नी की टीम वर्क ने बदल दी ज़िंदगी
रूपसिंह नाप लेकर कपड़े सिलते हैं और शारदाबेन उन पर आरी वर्क करती हैं. दोनों की मेहनत का नतीजा है कि आज उनकी बेटियां अच्छे स्कूलों में पढ़ीं और सबसे छोटी बेटी अब मेडिकल ऑफिसर बन चुकी है. इस काम से न सिर्फ घर चलता है, बल्कि उन्हें संतोष और आत्मसम्मान भी मिलता है.

संस्कृति को जिंदा रखने का भी है एक माध्यम
यह काम सिर्फ कमाई का जरिया नहीं है, बल्कि सौराष्ट्र की उस कला और संस्कृति को भी ज़िंदा रखने का जरिया है जो धीरे-धीरे लोगों की नज़रों से ओझल हो रही थी. आरी कढ़ाई से तैयार की गई चीजें आज के फैशन के साथ भी मेल खाती हैं और ग्राहकों को कुछ नया, सुंदर और अनोखा देती हैं.

संदेश साफ है – उम्र नहीं, जज़्बा मायने रखता है
वाघेला दंपत्ति की कहानी हमें यह सिखाती है कि उम्र कभी भी आपकी राह में रुकावट नहीं बन सकती. अगर दिल में कुछ करने की चाह हो, तो हर मोड़ पर एक नई शुरुआत की जा सकती है. उनका जीवन हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो सोचता है कि अब कुछ नया करना मुमकिन नहीं.

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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