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न बड़ा ब्रांड, न कोई दुकान फिर भी रोज बेचते 500 प्लेट…बाप-बेटे की ये जोड़ी ने खंडवा में हिट!

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मध्य प्रदेश के खंडवा शहर की एक भीड़भाड़ वाली गली में रोज़ सुबह एक ख़ास ठेला सजता है जहां से निकलती है दाल पकवान की खुशबू, जो पूरे मोहल्ले में फैल जाती है. लेकिन इसके पीछे सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि एक 30 साल पुरानी मेहनत, लगन और बाप-बेटे का रिश्ता छुपा है.

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इस ठेले की शुरुआत राजू सेनी ने की थी, जो आज 55 साल के हैं. उनके साथ अब उनका बेटा ललित सेनी (उर्फ़ सोनू), उम्र 31 साल का है, जो इस पारंपरिक स्वाद को नई सोच और स्टाइल से जोड़कर चला रहा है.

एक छोटे ठेले से शुरू हुआ सपना
करीब 30 साल पहले, राजू सेनी ने गली के एक कोने में छोटा-सा ठेला लगाया था. शुरुआत में ग्राहकों की संख्या कम थी, सुविधाएं भी नहीं थीं, लेकिन उन्होंने कभी स्वाद और सफाई से समझौता नहीं किया. धीमी आंच पर उबाली गई दाल, और कुरकुरे पकवान के साथ मसालों का सटीक मेल , यही बना उनका यूएसपी.

राजू सेनी हर सुबह 5 बजे उठकर खुद दाल भिगोते, पकाते और अपने ठेले को तैयार करते थे. धीरे-धीरे उनका स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ गया और उनका नाम इलाके में फैल गया.

बेटे ने दी नई रफ्तार , तकनीक और टच का संगम
ललित सेनी बचपन से पिता के साथ ठेले पर जाता था. वहीं से उसने दाल पकाने से लेकर ग्राहक संभालने तक सब कुछ सीखा. पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने ठेले को सिर्फ चलाया नहीं, बल्कि ब्रांड जैसा बना दिया.

उसने ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए प्लेट प्रेज़ेंटेशन सुधारा, साफ़-सफ़ाई बढ़ाई, समय की पाबंदी रखी और सोशल मीडिया पर भी थोड़ी पहचान बनाई. अब सुबह 7:30 बजे से लेकर दोपहर 3:30 बजे तक रोज़ाना 500 से ज़्यादा प्लेटें बिकती हैं.

ये सिर्फ ठेला नहीं, एक चलती-फिरती प्रेरणा है
राजू और ललित की ये जोड़ी आज सिर्फ खाने नहीं परोसती, बल्कि सफलता की कहानी भी परोस रही है. कई लोगों ने इन्हें देखकर अपने खाने के स्टॉल शुरू किए हैं. ये बाप-बेटे आज भी खुद हर प्लेट पर ध्यान देते हैं – ये बताते हैं कि अगर नीयत और मेहनत सच्ची हो, तो बड़ी दुकान नहीं, एक छोटा ठेला भी खंडवा की पहचान बन सकता है.

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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