नीता रैकबार/बुंदेलखंड समाचार
बकस्वाहा। थाना बकस्वाहा अंतर्गत ग्राम जुझारपुरा में संचालित छाबड़ा स्टोन क्रेशर सहित क्षेत्र के अन्य पत्थर क्रेशर अब सिर्फ प्रदूषण का नहीं, बल्कि मौत का सीधा कारण बनते जा रहे हैं। नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते ये क्रेशर गांव और सड़क दोनों को खतरनाक जोन में तब्दील कर चुके हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग अब भी आंख मूंदे बैठे हैं।
क्रेशर प्लांट से उड़ती महीन धूल ने पूरे गांव को ऐसे ढक लिया है मानो हर वक्त धुएं का गुबार छाया रहता हो। खेतों में खड़ी गेहूं, चना और सब्जियों की फसलें धूल की मोटी चादर में दबकर धीरे-धीरे मर रही हैं। किसानों की महीनों की मेहनत और लागत पर पानी फिरता दिख रहा है, लेकिन क्रेशर संचालकों को इसकी कोई परवाह नहीं।
सड़क पर चलना मतलब मौत को न्योता
छाबड़ा स्टोन क्रेशर के आसपास हालात और भी भयावह हैं।
20 से 30 मीटर की दूरी पर कुछ भी दिखाई नहीं देता। वाहन चालक मजबूरी में अंदाजे से वाहन चला रहे हैं, जिससे हर पल भीषण हादसे का खतरा मंडरा रहा है। दिसंबर माह में इसी क्षेत्र में धूल और खराब विजिबिलिटी के कारण एक युवक की दर्दनाक मौत हो चुकी है, इसके बावजूद न तो क्रेशर बंद हुए और न ही कोई ठोस सुरक्षा इंतजाम किए गए।
बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक बीमार
ग्रामीणों का कहना है कि गांव के छोटे-छोटे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सांस की बीमारी, आंखों में जलन, एलर्जी और लगातार खांसी से जूझ रहे हैं। दिन-रात उड़ती धूल ने लोगों का घर से बाहर निकलना तक मुश्किल कर दिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि छाबड़ा स्टोन क्रेशर सबसे ज्यादा नियमों की अनदेखी कर रहा है और बाकी क्रेशर उसी की तर्ज पर मनमानी कर रहे हैं।
नोटिस पर नोटिस, कार्रवाई शून्य
ग्रामीणों का आक्रोश इस बात को लेकर है कि प्रशासन की कार्रवाई सिर्फ नोटिस और कागजों तक सीमित है। बार-बार समझाइश के बावजूद न तो धूल नियंत्रण की मशीनें चालू हैं और न ही पानी छिड़काव जैसी अनिवार्य व्यवस्थाएं की जा रही हैं।
इस संबंध में तहसीलदार भरत पांडेय ने कहा कि क्रेशर संचालकों को पूर्व में नोटिस देकर नियमों का पालन करने की हिदायत दी गई है। यदि इसके बाद भी नियमों का उल्लंघन किया गया तो दोषी क्रेशर संचालकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
अब सवाल यह है कि
क्या प्रशासन किसी और मौत का इंतजार कर रहा है, या जुझारपुरा की हवा को फिर से सांस लेने लायक बनाया जाएगा?










