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भक्ति, भाव और अभिनय का त्रिवेणी संगम: ‘विरासत कला उत्सव’ में जीवंत हुए संत तुकाराम; संजय मेहता के अभिनय ने दर्शकों को कराया आत्मिक साक्षात्कार

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छतरपुर | छतरपुर का ऑडिटोरियम गुरुवार की शाम एक पावन तपोभूमि में बदल गया। अवसर था उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज एवं जिला प्रशासन के ‘विरासत कला उत्सव’ का तीसरा दिन, जहाँ महाराष्ट्र की माटी के महान संत तुकाराम का जीवन दर्शन मंच पर अवतरित हुआ। फिल्म ‘धुरंधर’ फेम चर्चित अभिनेता संजय मेहता ने अपनी सधी हुई देह-बोली और गंभीर संवाद अदायगी से संत तुकाराम के चरित्र में प्राण फूंक दिए, जिससे दर्शक भक्ति और कला के एक अनूठे संसार में खो गए।
साधना, संघर्ष और सुधार की संगीतमय गाथा
नाटक ‘संत तुकाराम’ ने केवल एक महापुरुष की जीवनी नहीं दिखाई, बल्कि समाज की कुरीतियों पर उनके प्रहार और ईश्वर के प्रति उनके अनन्य समर्पण को भी प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। मंच पर जब संत तुकाराम के ‘अभंग’ गूँजे, तो ऑडिटोरियम का कोना-कोना आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। वरिष्ठ रंगकर्मी रंजना तिवारी ने तुकाराम की पत्नी की भूमिका में अपने सशक्त अभिनय से गृहस्थी और साधना के बीच के द्वंद्व को बखूबी उकेरा।
विद्वतजनों ने दीप प्रज्वलन कर किया कला का वंदन
समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि न्यायाधीश विष्णु प्रसाद सोलंकी (सचिव, विधिक सेवा प्राधिकरण), प्रो. जे.पी. मिश्र (पूर्व कुलसचिव), नगर पालिका अध्यक्ष ज्योति चौरसिया, गांधीवादी प्रेमनारायण मिश्रा और मनीष दोसाज द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। अतिथियों ने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का सेतु हैं।
नेपथ्य की मेहनत और मंच की जादुई साज-सज्जा
निर्देशक और लेखक स्वयं संजय मेहता रहे, जिन्होंने संगीत में जमीर हुसैन के साथ मिलकर एक कर्णप्रिय वातावरण निर्मित किया। आदित्य शर्मा के गीतों और सीमा मौरे की रूप-सज्जा ने दृश्यों को वास्तविकता के करीब ला खड़ा किया। मोहम्मद फ़ैज़ान, चित्रांश कुमार, और अंकिता पाल सहित सभी सहयोगी कलाकारों के सधे हुए अभिनय ने नाटक की गरिमा को शिखर तक पहुँचाया। प्रकाश व्यवस्था और संगीत संचालन (प्रिंस मलिक, नीरज प्रजापति) ने आध्यात्मिक परिवेश को और भी गहरा बना दिया।

Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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