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अस्पताल के गलियारे में बैठकर इलाज करने की यह तस्वीर उन डॉक्टरों के लिए एक सबक है जो मरीजों को सिर्फ एक नंबर समझते हैं

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आज के दौर में जहाँ इलाज एक धंधा बनता जा रहा है, वहाँ डॉ. मनोज चौधरी जैसे जांबाज डॉक्टर छतरपुर की शान हैं। अस्पताल के गलियारे में बैठकर इलाज करने की यह तस्वीर उन डॉक्टरों के लिए एक सबक है जो मरीजों को सिर्फ एक नंबर समझते हैं। यह खबर किसी मसीहा से कम नहीं है! जब अस्पताल के बंद कमरों में एसी की हवा खाने के बजाय कोई डॉक्टर जनता के बीच पसीने में बैठकर इलाज करने बैठ जाए…

छतरपुर। लोग कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों में सिर्फ लंबी लाइनें और डॉक्टरों का इंतज़ार मिलता है, लेकिन डॉ. मनोज चौधरी ने साबित कर दिया कि वह सच में अलग ही मिट्टी के बने हैं। मंगलवार को जब जिला अस्पताल में मरीजों का सैलाब उमड़ा और ओपीडी के बाहर पैर रखने की जगह नहीं बची, तब इस डॉक्टर ने जो किया, उसने हर किसी का दिल जीत लिया।
भीड़ देख पिघला दिल, बाहर ही सजा लिया ‘दरबार’
अस्पताल में सुबह से ही मरीजों की भारी भीड़ थी। बेहाल मरीज और उनके तीमारदार घंटों से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। जब प्रसिद्ध सर्जन डॉ. मनोज चौधरी ने अपने चैंबर से बाहर झाँका और मरीजों का दर्द देखा, तो उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने वीआईपी कल्चर और बंद दरवाजे के प्रोटोकॉल को किनारे रखा, एक कुर्सी मंगवाई और गैलरी में ही मरीजों के बीच बैठ गए।
लाइन में खड़े-खड़े ही मिल गया इलाज
डॉक्टर साहब ने लाइन में लगे मरीजों के पास जाकर वहीं उनकी नब्ज टटोली, हालचाल पूछा और पर्चे लिख दिए। जो मरीज घंटों से अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, उन्हें डॉक्टर को अपने बीच पाकर बड़ी राहत मिली। डॉ. चौधरी की इस संवेदनशीलता ने न केवल भीड़ का दबाव कम किया, बल्कि सरकारी सिस्टम पर जनता का भरोसा भी बढ़ा दिया।
मरीजों को तड़पता नहीं देख सकता
इस नेक पहल पर जब डॉ. मनोज चौधरी से बात की गई, तो उन्होंने सादगी से कहा— भीड़ बहुत ज्यादा थी और मरीज परेशान हो रहे थे। उन्हें ज्यादा देर तक कतार में खड़ा देखना तकलीफदेह था, इसलिए बाहर आकर ही परामर्श देना उचित समझा।

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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