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Success Story: गुमला की संतोषी बनी मिसाल, गन्ना जूस बेचकर चला रहीं घर

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Success Story: गुमला की संतोषी उरांव ने हिमाचल के ईंट भट्ठे से लौटकर गांव में गन्ना की खेती शुरू की और गन्ना जूस बेचकर आत्मनिर्भर बनीं. जानिए उनकी प्रेरणादायक कहानी.

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ईट भटा में मजदूरी छोड़ गांव लौटी,अब गन्ना की खुद से खेती कर बेच रही गन्ना जूस, ल

हाइलाइट्स

  • संतोषी उरांव ने गन्ना जूस बेचकर आत्मनिर्भरता पाई.
  • हिमाचल से लौटकर गांव में गन्ना की खेती शुरू की.
  • संतोषी की कहानी महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी.

गुमला: जहां एक ओर गुमला जैसे ज़िलों से लोग आज भी रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं, वहीं घाघरा प्रखंड की रन्हे उरांव बस्ती की संतोषी उरांव ने इस ट्रेंड को पलटकर रख दिया है. एक वक्त था जब संतोषी अपने पति के साथ हिमाचल प्रदेश में ईंट भट्ठे पर मजदूरी करती थीं. वहां मेहनत ज्यादा और आमदनी बेहद कम थी. बच्चों की पढ़ाई और परिवार की ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती थीं. मगर अब वो अपने गांव में रहकर गन्ना की खेती कर रही हैं और ताज़ा गन्ने का जूस बेचकर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं.

संतोषी ने 2017-18 में अपने गांव लौटने का फैसला किया. उनके मुताबिक, “वहां जान जोखिम में डालकर काम करना पड़ता था और महीने के 8-10 हजार रुपये ही मिलते थे.” गांव लौटने के बाद उन्होंने 2020 से खेतीबाड़ी शुरू की और इस साल एक एकड़ ज़मीन में गन्ना बोया. सिर्फ 15-20 हजार रुपये के निवेश से उनकी फसल इतनी अच्छी हुई कि अब चार से पांच गुना मुनाफे की उम्मीद है.

दिन में गन्ने का जूस, बाकि टाइम धान की खेती
गर्मी के मौसम में संतोषी बाबा नगरी देवाकी धाम से एक किलोमीटर आगे, पुल के ऊपर बरगद के पेड़ के नीचे गन्ना जूस का स्टॉल लगाती हैं. सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक यहां नींबू, पुदीना और नमक के साथ ताज़ा गन्ने का स्वादिष्ट और सेहतमंद जूस ₹10 और ₹20 के ग्लास में उपलब्ध होता है. मार्च से जुलाई तक यह जूस स्टॉल चलती है, जबकि बाकी समय में संतोषी धान की खेती और चना बेचने का काम करती हैं.

संतोषी का बदल गया जीवन
उनके इस फैसले से न सिर्फ उनका परिवार बेहतर जीवन जी पा रहा है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और परवरिश भी पहले से कहीं बेहतर हो गई है. संतोषी कहती हैं कि आज गांव में रहकर मैं खुश हूं. मेरे पति का पूरा सहयोग मिला, तभी यह संभव हो पाया.

संतोषी का क्या कहना है
संतोषी की यह कहानी बताती है कि अगर हौसला हो तो गांव की मिट्टी भी रोज़गार दे सकती है. उनकी मेहनत अब आसपास की महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही है.

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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