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Baureshwar Mahadev is divine in the ravines of Chambal | चंबल की बीहड़ों में विराजित है प्राचीन बौरेश्वर महादेव: गुफा से लेकर कुंड तक के अनूठे किस्से; महाशिवरात्रि पर दूरदराज से पहुंच रहे श्रध्दालु – Bhind News

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चंबल की बीहड़ों में बसा भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर, जिसकी मान्यता महाभारत काल तक जाती है। यह मंदिर अपने रहस्यमयी और चमत्कारिक स्वरूप के कारण श्रद्धालुओं को आश्चर्यचकित कर देता है। इस मंदिर में स्थित शिवलिंग स्वयं-भू है।

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इस मंदिर को लेकर लोगों के बीच आज भी कई किवंदितियां है। चंबल के लोग मंदिर को लेकर आज भी कहानी किस्से सुनाते हैं। इसके अलावा सबसे खास बात यह है कि इस मंदिर का निर्माण 12 हजार साल पहले महाभारत काल में होना बताया जाता है। इस मंदिर की दीवारों की चौड़ाई आज भी 11 फीट है। इतनी चौड़ी दीवारों का मध्य प्रदेश का एक मात्र मंदिर है।

महाशिवरात्रि पर्व पर आज हम बात कर रहे हैं भिंड जिले के अटेर क्षेत्र में स्थित बौरेश्वर महादेव मंदिर की। यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि वे इसके अद्भुत रहस्य और दिव्य ऊर्जा इसे एक अनूठा तीर्थ स्थल बनाते हैं।

मंदिर का ऊपर के चार खंड। द्वितीय खंड का प्रवेश गेट।

मंदिर का ऊपर के चार खंड। द्वितीय खंड का प्रवेश गेट।

मंदिर के गर्भगृह में महादेव के शिवलिंग के पास एक रहस्यमयी कुंड स्थित है, जिसकी गहराई लगभग तीन से चार फीट है। लोगों के अनुसार, इसमें कितना भी अभिषेक का जल, बेलपत्र या पूजा की अन्य सामग्री डाली जाए, वह गायब हो जाती है।

सदियों से इस कुंड की यही स्थिति बनी हुई है। इसी तरह से मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग के पास एक गुफा का द्वार भी है, जो सीधे जमीन के अंदर जाता है। इस गुफा की गहराई कितनी है, इसका आज तक कोई पता नहीं लगा सका।

मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार पर आज भी मुगल आक्रांताओं के निशान मौजूद है।

मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार पर आज भी मुगल आक्रांताओं के निशान मौजूद है।

औरंगजेब सेना समेत भागा था इस मंदिर से जुड़ी एक और रोचक कथा यह है कि मुगल शासक औरंगजेब ने इस मंदिर को ध्वस्त करने के लिए अपनी सेना भेजी थी, लेकिन जब सैनिक मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने लगे, तो अदृश्य शक्तियों द्वारा उन्हें बाहर फेंक दिया गया। यहां तक कि औरंगजेब स्वयं भी मंदिर के भीतर नहीं जा सका।

अद्भुत वास्तुकला

मंदिर की ऊंचाई लगभग 40 फीट है और यह नागर शैली में निर्मित है, जिसकी दीवारें 11 फीट मोटी और ठोस हैं। इसके मुख्य द्वार पर प्राचीन नक्काशी देखने को मिलती है, जिसमें शिवगण, द्वारपाल और अन्य देवी-देवताओं की आकृतियां उकेरी गई हैं।

मंदिर के बाहर विराजमान नंदी महाराज की प्रतिमा।

मंदिर के बाहर विराजमान नंदी महाराज की प्रतिमा।

महाशिवरात्रि पर विशेष उत्सव

मंदिर में महाशिवरात्रि, सावन के सोमवार और मौरछट के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन किया गया है। दूर-दराज से श्रद्धालु यहां भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने और मंदिर से जुड़े चमत्कारिक रहस्यों को अनुभव करने आ रहे हैं।

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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