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गैस किल्लत का कृत्रिम संकट! सर्वर फेल होने के पीछे ₹60 की लूट छिपाने का बड़ा खेल तो नहीं?

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अरविन्द जैन
​छतरपुर। जिले सहित पूरे मध्यप्रदेश में इन दिनों रसोई गैस उपभोक्ताओं और व्यापारियों के बीच हाहाकार मचा हुआ है। ताज्जुब की बात यह है कि गैस एजेंसियों के गोदाम सिलेंडरों से लबालब भरे हैं, लेकिन आम आदमी की पहुँच से वे कोसों दूर कर दिए गए हैं। डिजिटल इंडिया का सर्वर उस वक्त रहस्यमयी तरीके से कोमा में चला गया, जब सरकार ने चुपके से बेतहाशा वृद्धि कर घरेलू सिलेंडर पर ₹60 और कमर्शियल सिलेंडर पर ₹115 का भारी बोझ जनता की जेब पर डाल दिया।


कहीं विरोध की आवाज दबाने की स्मार्ट साजिश तो नहीं
जानकारों और उपभोक्ताओं का मानना है कि यह तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। सर्वर फेल करके ऐसी स्थिति पैदा की जा रही है कि उपभोक्ता बढ़े हुए दामों का विरोध करने के बजाय इस बात पर खुश हो जाए कि उसे किसी भी तरह सिलेंडर मिल गया। जब सिलेंडर की कृत्रिम किल्लत दिखाई जाती है, तो इंसान अपनी जरूरत के आगे महंगाई के सवाल भूल जाता है। सरकार का यह मैनेजमेंट आम आदमी की मजबूरी का फायदा उठाने जैसा है।
मध्य प्रदेश में सबसे महंगी गैस
मध्य प्रदेश के उपभोक्ताओं पर दोहरी मार पड़ रही है। पहले से ही भारी टैक्स के कारण यहाँ गैस की कीमतें अन्य राज्यों से अधिक हैं, और अब मार्च के पहले हफ्ते में ही कॉमर्शियल सिलेंडर पर कुल ₹143 (₹115 + ₹28) की वृद्धि और पूरे साल का हिसाब जोड़ें तो कॉमर्शियल गैस अब तक ₹300 से ज्यादा महंगी हो चुकी है। इस वृद्धि ने होटल और छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। छतरपुर में अब कॉमर्शियल सिलेंडर ₹1,930 के पार पहुँच रहा है, जिसकी सप्लाई भी होटल, रेस्टोरेंट एवं विवाह घरों में रोक दी गयी हैं जिससे आम आदमी की थाली और महंगी होने वाली है।
आम जनता के लिए DAC की जंजीरें, साहबों के लिए नियमों की खैरियत!
गैस एजेंसी संचालकों ने बताया कि प्रशासन के नए निर्देशों के मुताबिक, कुल सप्लाई का 80 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ DAC नंबर के जरिए ही वितरित होगा। यह नियम सुनने में तो पारदर्शी लगता है, लेकिन इसकी कड़वी हकीकत यह है कि यह पारदर्शिता सिर्फ आम उपभोक्ताओं की गर्दन नापने के लिए है।
20 प्रतिशत का शाही कोटा और अधिकारियों की चांदी
हैरानी की बात यह है कि प्रशासन ने बाकी बचा 20 प्रतिशत कोटा सुरक्षित रखा है—लेकिन किसके लिए? उन खास लोगों और अधिकारियों के लिए, जिन्हें न सर्वर फेल होने की चिंता है और न ही DAC नंबर के झंझट की। आम आदमी सर्वर डाउन होने के कारण DAC कोड के लिए मोबाइल की स्क्रीन घिस रहा है, वहीं रसूखदारों के घरों में बिना किसी वेरिफिकेशन के गैस सिलेंडर पहुँचाए जा रहे हैं। क्या अधिकारियों के घर का चूल्हा अलग तकनीक से जलता है जो उन्हें DAC की जरूरत नहीं?

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मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और संघर्ष के कारण वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ गया है। इससे पैनिक बुकिंग और जमाखोरी की आशंका बढ़ी थी। सरकार ने इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाया है। अब एक सिलेंडर डिलीवरी के बाद दूसरा बुक करने के लिए कम से कम 25 दिनों का इंतजार करना होगा। यह नियम सभी घरेलू एलपीजी कनेक्शनों पर लागू है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सर्वर तभी फेल होता है जब कीमतें बढ़ाई जाती हैं? जनता अब इस गजब के दिमाग और लूट के इस नए गाउन को समझने लगी है। जनता की खामोशी को उसकी कमजोरी न समझा जाए। जब चूल्हा जलना बंद होता है, तो आक्रोश की लपटें सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुँचती हैं। निश्चित ही यदि जल्द ही सर्वर बहाल कर बुकिंग शुरू नहीं की गई, तो जनता का आक्रोश सड़कों पर उतरने को मजबूर होगा।

मध्य प्रदेश में सबसे बड़ी ऐतिहासिक वृद्धियाँ:

  1. फरवरी 2020 : मध्य प्रदेश में 12 फरवरी 2020 को सिलेंडर की कीमतों में ₹145.50 से ₹149.00 तक की भारी बढ़ोतरी हुई थी। भोपाल में सिलेंडर की कीमत ₹747 से उछलकर ₹892.50 पर पहुँच गई थी। हालांकि, उस समय सब्सिडी भी बढ़ाई गई थी, लेकिन बिना सब्सिडी वाले उपभोक्ताओं के लिए यह एक बड़ा झटका था।
  2. मार्च 2017: प्रदेश में 1 मार्च 2017 को एक ही दिन में ₹86.50 की वृद्धि की गई थी। उस समय भोपाल में रेट ₹685.50 से बढ़कर ₹772 हो गए थे।
  3. मार्च 2026 (हालिया वृद्धि): 7 मार्च 2026 को मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में औसतन ₹60.50 की वृद्धि हुई है। वर्तमान में भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में घरेलू सिलेंडर की कीमत ₹940 से ₹950 के बीच पहुँच गई है
Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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