बकस्वाहा। सरकारी दफ्तरों में बैठे हुक्मरान जब खुद को जनता का सेवक नहीं, बल्कि ‘शासक’ समझने लगें, तो लोकतंत्र का चेहरा बकस्वाहा जैसा नजर आने लगता है। महिला एवं बाल विकास विभाग की परियोजना अधिकारी हेमलता ठाकुर पर एक गरीब ग्रामीण के साथ अभद्रता, जातिसूचक अपमान और जान से मारने की धमकी दिलवाने के सनसनीखेज आरोप लगे हैं। आंगनवाड़ी के भोजन का बकाया भुगतान मांगना एक ग्रामीण को इतना भारी पड़ा कि अब उसे अपनी जान की गुहार लगाने के लिए कलेक्टर और एसपी की चौखट पर दस्तक देनी पड़ रही है।
जानकारी मांगी तो मिली ‘दुत्कार’
गेवलारी निवासी घूमन अहिरवार जब अपने पसीने की कमाई और आंगनवाड़ी अनुबंध की जानकारी लेने परियोजना कार्यालय पहुँचा, तो उसे क्या पता था कि वहाँ ‘मैडम’ का पारा सातवें आसमान पर होगा। आरोप है कि परियोजना अधिकारी हेमलता ठाकुर ने जानकारी देने के बजाय न केवल तीखे शब्दों का प्रयोग किया, बल्कि उसे दफ्तर से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया। सवाल उठता है कि क्या सरकारी दफ्तर किसी की निजी जागीर हैं, जहाँ सूचना मांगना अपराध बन गया है?

आरोपों की जद में ‘अधिकारी’
आवेदक घूमन अहिरवार का दावा है कि उसके पास इस पूरे अपमानजनक घटनाक्रम का वीडियो सुरक्षित है। आरोप बेहद संगीन हैं—कार्यालय के भीतर अपमानित करना और बाहर निकलते ही जातिसूचक शब्दों से प्रहार करना। प्रत्यक्षदर्शी फूलबाई और संजय अहिरवार भी इस शर्मनाक रवैये की गवाही दे रहे हैं। प्रशासन को यह सोचना होगा कि आखिर किस कानून के तहत एक अधिकारी को जनता को अपमानित करने का लाइसेंस मिला हुआ है?
गुंडागर्दी पर उतरा विभाग? फोन पर दी जा रही ‘मिटाने’ की धमकी
मामला यहीं नहीं थमा। शिकायतकर्ता का आरोप है कि घटना के बाद उसे अज्ञात फोन कॉल के जरिए फर्जी केस में फंसाने और जान से मारने की धमकी दी जा रही है। क्या बकस्वाहा का महिला एवं बाल विकास विभाग अब गुंडागर्दी और धमकियों के दम पर भ्रष्टाचार की परतें छिपाने की कोशिश कर रहा है?
जब इस पूरे मामले पर पक्ष जानने के लिए परियोजना अधिकारी हेमलता ठाकुर को फोन किया गया, तो उन्होंने कॉल काट दिया। सवालों से भागना यह बताने के लिए काफी है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। वहीं तहसीलदार ने हमेशा की तरह ‘शिकायत मिलने पर जांच’ का घिसा-पिटा जुमला दोहरा दिया है।
अगर वीडियो में लगे आरोपों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो यह ‘एससी-एसटी एक्ट’ और ‘पद के दुरुपयोग’ का गंभीर मामला है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन अपनी इस ‘विवादित’ अधिकारी को बचाता है या गरीब ग्रामीण को न्याय दिलाता है।










