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51 फीट ऊंचा दीप स्तंभ जला, दीपक टूटकर गिरे; राजस्थान से बुलाए गए कारीगर | A dozen lamps fell from the lamp pillar, the fire brigade controlled the fire

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उज्जैन37 मिनट पहले

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51 शक्तिपीठों में से एक माता हरसिद्धि के मंदिर में स्थित दीप स्तंभ में गुरुवार को आग लग गई। दीप स्तंभ के के एक दर्जन से अधिक दीप खंडित हो गए। मंदिर में कुछ देर के लिए अफरा-तफरी के हालात बन गए। दमकल टीम ने आग पर काबू पाया।

मंदिर के पंडित राजेश गोस्वामी ने बताया कि दोपहर 1 बजे साउथ से आई कुछ महिला श्रद्धालुओं ने 108 दीप प्रज्ज्वलित कर दीप स्तंभ के पास रख दिए। इन्हीं दीपकों की वजह से दो दीप स्तंभ में से एक ने आग पकड़ ली। देखते ही देखते आग बढ़ गई। 51 फीट ऊंचे दीप स्तंभ के निचले हिस्से की आग तो मंदिर कर्मचारियों ने बुझा दी, लेकिन ऊपर के हिस्से में लगी आग पर काबू नहीं पा सके। फायर ब्रिगेड की टीम ने आधे घंटे में आग को बुझाया।

पंडित गोस्वामी ने बताया कि एक दर्जन से ज्यादा दीपक टूट गए हैं, जिन्हें बनाने के लिए राजस्थान से कारीगरों को बुलाया है। जब तक दीप स्तंभ दोबारा बन नहीं जाता, तब तक प्रतीकात्मक रूप से स्तंभ के नीचे के दीप जलाए जाएंगे।

गुरुवार दोपहर 1 बजे साउथ से आई कुछ महिला श्रद्धालुओं ने 108 दीप प्रज्ज्वलित कर दीप स्तंभ के पास रख दिए। इन्हीं दीपकों की वजह से आग लग गई।

गुरुवार दोपहर 1 बजे साउथ से आई कुछ महिला श्रद्धालुओं ने 108 दीप प्रज्ज्वलित कर दीप स्तंभ के पास रख दिए। इन्हीं दीपकों की वजह से आग लग गई।

राजा विक्रमादित्य के जमाने के है दीप स्तंभ

मंदिर में स्थापित 51 फीट ऊंचे 1100 दीपों के दो दीप स्तंभ हैं। इनमें से एक स्तंभ में आग लगी थी। हरसिद्धि मंदिर में मौजूद दोनों स्तंभ अति प्राचीन हैं। मान्यता है कि इन्हें राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था। उस जमाने से इसमें दीपक जलते आ रहे हैं। आज भी इन दीप स्तंभों को रोशन करने के लिए तीन – तीन महीने की वेटिंग चलती है।

यह मंदिर देशभर में 51 शक्तिपीठों में शामिल है। हरसिद्धि माता राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी भी मानी जाती हैं। यहीं पर मौजूद है 2000 साल पुराना 51 फीट ऊंचा दीप स्तंभ। इसमें करीब 1011 दीए हैं। इन दीयों को 6 लोग 5 मिनट में प्रज्ज्वलित कर देते हैं। इसके बाद पूरा मंदिर रोशनी से जगमग हो उठता है। इसमें 60 लीटर तेल और 4 किलो रुई लगती है।

पहले जानते हैं क्या है मान्यता

शास्त्रों के अनुसार माता सती के पिता राजा दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया था। इसमें सभी देवी-देवता को आमंत्रित किया गया था, लेकिन भगवान शिव को नहीं बुलाया गया। यहां पहुंचने पर माता सती को ये बात पता चली। माता सती को शिव का अपमान सहन नहीं हुआ। उन्होंने खुद को यज्ञ की अग्नि के हवाले कर दिया।

भगवान शिव को ये पता चला, तो वे क्रोधित हो गए। वे सती का मृत शरीर उठाकर पृथ्वी का चक्कर लगाने लगे। शिव को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाकर माता सती के अंग के 51 टुकड़े कर दिए। माना जाता है कि जहां-जहां माता सती के शरीर के टुकड़े गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। उज्जैन में इस स्थान पर सती माता की कोहनी गिरी थी। इस मंदिर का नाम हरसिद्धि रखा गया। जानिए, 1011 दीपक जलाने की कहानी

हरसिद्धि माता राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी हैं। मंदिर में सबसे आकर्षण का केंद्र मंदिर परिसर में स्थापित 2 दीप स्तंभ हैं। ये दीप स्तंभ करीब 51 फीट ऊंचे हैं। दोनों दीप स्तंभों को मिलाकर 1 हजार 11 दीपक हैं। मान्यता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना राजा विक्रमादित्य ने करवाई थी। ये दीप स्तंभ 2 हजार साल से अधिक पुराने हैं। पहले इन्हें त्योहार, नवरात्र में ही जलाया जाता था। अब ये सालभर रोशन रहते हैं। दोनों स्तंभों पर दीप जलाने का खर्च 15 हजार

दोनों दीप स्तंभों पर दीप जलाने का खर्च करीब 15 हजार रुपए आता है। इसके लिए पहले बुकिंग करवानी होती है। हरसिद्धि माता मंदिर में आगामी 10 दिसंबर तक बुकिंग पूरी हो चुकी है। दीप स्तंभों पर चढ़कर हजारों दीपकों को जलाना सहज नहीं है। उज्जैन का रहने वाला जोशी परिवार करीब 100 साल से इन दीप स्तंभों को रोशन कर रहा है।

दोनों दीप स्तंभों को एक बार जलाने में करीब 4 किलो रुई की बाती और 60 लीटर तेल लगता है। समय-समय पर इन दीप स्तंभों की सफाई भी की जाती है। वर्तमान में मनोहर, राजेंद्र जोशी, ओम चौहान, आकाश चौहान, अर्पित और अभिषेक इस परंपरा को कायम रखे हैं।

उज्जैन में इस स्थान पर सती माता की कोहनी गिरी थी। इस मंदिर का नाम हरसिद्धि रखा गया।

उज्जैन में इस स्थान पर सती माता की कोहनी गिरी थी। इस मंदिर का नाम हरसिद्धि रखा गया।

6 लोग 5 मिनट में जला देते हैं 1011 दीपक

रोजाना शाम को मंदिर में आरती के दौरान 6 लोग दीप स्तंभ पर चढ़कर करीब 5 मिनट में 1011 दीपक रोशन कर देते हैं। ये काम काफी जोखिम भरा होता है। सभी दीयों में तेल डालते समय पूरा स्तंभ तेल में भीग जाता है। इससे फिसलन के कारण गिरने की आशंका रहती है। रोजाना दीप जलाने के लिए 2500 रुपए का मेहनताना भी दिया जाता है, जो 6 लोगों में बांट दिया जाता है। साल भर में 2 स्तंभों के 5 हजार दीपक समय-समय पर बदले जाते हैं।

एक घंटे पहले शुरू हो जाती है तैयारी

मंदिर में शाम 7 बजे आरती होती है। इसके पहले दोनों दीप स्तंभ पर दीप प्रज्ज्वलित करने के लिए एक घंटे पहले से तैयारी शुरू हो जाती है। इसके लिए 6 लोग काम में जुट जाते हैं। आरती का समय होते ही 1011 दीपों को 5 मिनट में रोशन कर दिया जाता है। जब सभी दीये प्रज्ज्वलित हो जाते हैं, तो नजारा देखने लायक होता है। आरती के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहते हैं।

अब जान लीजिए 51 शक्तिपीठ कहां-कहां हैं…

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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