छतरपुर | जिले के बड़ामलहरा सिविल अस्पताल से एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आई है, जिसने न केवल ‘नर्स’ के सेवाभावी पेशे को कलंकित किया है, बल्कि स्वास्थ्य विभाग के संरक्षणकारी चेहरे को भी बेनकाब कर दिया है। एक संविदा स्टाफ नर्स द्वारा अविवाहित युवती का अवैध गर्भपात करने और उसकी जान जोखिम में डालने का मामला जांच में सही पाए जाने के बावजूद, वरिष्ठ कार्यालय की मेहरबानी से आरोपी नर्स अब भी कार्रवाई की आंच से बची हुई है।
पैसों की हवस और फर्जी हस्ताक्षर का खेल
मामला मई 2025 का है, जब टीकमगढ़ की एक अविवाहित लड़की को संविदा नर्सिंग ऑफिसर प्रीतू दुबे ने अपने जाल में फंसाया। आरोप है कि 16 हजार रुपये की लालच में प्रीतू ने नियम विरुद्ध गर्भपात (Abortion) किया। इस दौरान लापरवाही की हद पार हो गई और लड़की की बच्चेदानी फट गई।
जब मामला बिगड़ा, तो आरोपी नर्स ने अपनी गर्दन बचाने के लिए डॉ. हरगोविंद राजपूत के फर्जी हस्ताक्षर कर मरीज को रेफर कर दिया। लड़की की हालत इतनी खराब थी कि उसे झांसी और ग्वालियर के अस्पतालों में जीवन-मृत्यु के बीच जूझना पड़ा।
जांच रिपोर्ट में ‘गुनाह’ कबूल, फिर चुप्पी क्यों?
स्वास्थ्य विभाग की तीन सदस्यीय जांच टीम (डॉ. एस. प्रजापति, डॉ. सुरेखा खरे और कपिल डावर) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि:

प्रीतू दुबे ने MPT एक्ट 1971 का सरेआम उल्लंघन किया।
ऑडियो रिकॉर्डिंग और पीड़ित के बयानों से 16 हजार रुपये के लेनदेन की पुष्टि हुई।
रेफर स्लिप पर फर्जी साइन किए गए और ड्यूटी डॉक्टर को सूचना तक नहीं दी गई।
साहबों की ‘सेटिंग’ या कार्रवाई से डर?
हैरानी की बात यह है कि सीएमएचओ ने जांच प्रतिवेदन कलेक्टर और महिला आयोग को भेज दिया है, लेकिन जॉइंट डायरेक्टर (JD) सागर कार्यालय में इस कार्रवाई की फाइल महीनों से धूल फांक रही है। सूत्रों की मानें तो नर्सिंग शाखा प्रभारी के पास यह फाइल ‘विशेष दबाव’ के चलते दबाकर रखी गई है।
शिकायतकर्ता की चेतावनी:
शिकायतकर्ता रामकुमार कुशवाहा ने सिस्टम के इस ढुलमुल रवैये पर आक्रोश जताते हुए कहा है कि यदि अविलंब एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं की गई और आरोपी नर्स की सेवाएं समाप्त नहीं हुईं, तो वे मुख्यमंत्री, महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग के दरवाजे खटखटाएंगे।










