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जब सबने हार मान ली, तब खोराकीवाला ने बनाई वो दवा जो मौत को मात दे रही है, 83 साल की उम्र में भी मैदान डटे

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नई दिल्ली. जब ज्यादातर लोग 80 साल की उम्र में आराम करते हैं, तब वॉकहार्ट के चेयरमैन हबीब खोराकीवाला एक नई शुरुआत कर रहे हैं. 83 साल की उम्र में भी उनका जोश वैसा ही है, जैसे कोई युवा स्टार्टअप फाउंडर अपने पहले आइडिया को लेकर होता है. वॉकहार्ट को एक नई दिशा देने के मिशन में जुटे खोराकीवाला अब ऐसी दवाओं पर फोकस कर रहे हैं, जो दुनिया को सबसे ज़रूरी और सबसे मुश्किल बीमारियों से बचा सकती हैं. खासकर, एंटीबायोटिक्स यानी जीवाणु-नाशक दवाएं, जिनका असर अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है.

जैनिच: जब कोई दवा काम ना करे, ये काम करे
खोराकीवाला की बनाई जैनिच नाम की दवा उन संक्रमणों पर असर कर रही है, जिनका अब तक कोई इलाज नहीं था. अमेरिका में एक कैंसर मरीज की जिंदगी इस दवा ने तब बचाई, जब सारे विकल्प खत्म हो चुके थे. भारत में भी यह दवा 20 फीसदी बेहतर नतीजे दे रही है, खासकर यूटीआई (मूत्र संक्रमण) के मामलों में. खोराकीवाला कहते हैं कि ‘अगर कोई सौदे में हमारी दवा की कीमत नहीं समझेगा, तो हम अकेले ही आगे बढ़ेंगे.’

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वॉकहार्ट की वापसी की कहानी
2009 में कंपनी ने विदेशी कर्ज चुकाने में चूक की. FDA ने फैक्ट्रियों में खामियां पाईं. स्टॉक गिरा, निवेशकों ने भरोसा खो दिया. लेकिन खोराकीवाला ने हार नहीं मानी. उन्होंने अस्पतालों, न्यूट्रिशन बिजनेस और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स तक बेच दिए, लेकिन रिसर्च विंग को हाथ नहीं लगाया. उनका मानना था कि अगर रिसर्च करनी है, तो पूरी शिद्दत से करो, वरना मत करो.

जब पूरी दुनिया हार माने, तब रिसर्च जीतती है
WCK 5222 यानी जैनिच, और Miqnaf जैसी दवाएं सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया भर के डॉक्टर्स के लिए उम्मीद बन चुकी हैं. खोराकीवाला के मुताबिक, ये दवाएं ऐसी बीमारियों पर काम करती हैं जिन पर पुरानी दवाएं बेअसर हो चुकी हैं. उनका सपना है कि भारत में ये दवाएं कम कीमत पर मिलें. चाहे अमेरिका में इनका इलाज 10-15 हजार डॉलर तक क्यों ना हो.

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रिसर्च पर फोकस, मैन्युफैक्चरिंग आउटसोर्स
खोराकीवाला ने साफ कहा कि अब वो अमेरिका के लिए दवा बनाने का काम खुद नहीं करेंगे. सब कुछ आउटसोर्स करेंगे ताकि फोकस सिर्फ रिसर्च पर रहे. उनकी टीम अब अगली दवा पर काम कर रही है, जो मौखिक रूप से ली जा सकेगी और जैनिच जैसी ही असरदार होगी. दुनिया को जिस इलाज की सबसे ज़्यादा जरूरत है, भारत से आ सकती है. भारत में हर साल 10 लाख लोग मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंस से मरते हैं, जो कोविड से हुई मौतों से चार गुना ज़्यादा है. ऐसे में जैनिच जैसी दवाएं केवल एक व्यवसायिक सफलता नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी भी बन जाती हैं.

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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