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आज हम दूसरों को सुखी देखकर दु:खी हैं। अपने आप से कोई इस संसार में दु:खी नहीं है। आज जो आत्महत्या हो रही है, वह भी दूसरों के साथ तुलना करने से हो रही है। उसके इतने नंबर आए, तुम्हारे कम क्यों आए। इस प्रकार से माता-पिता अपने बच्चे की तुलना पास के बच्चे
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अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर जी महाराज ने हाई लिंक सिटी में गुरुवार को धर्मसभा में यह बात कही।

पूजा-विधान में हिस्सा लेते श्रद्धालु।
भक्तामर महामंडल विधान में 280 अर्घ्य चढ़ाए
चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के नवें दिन हाई लिंक सिटी में भक्तामर महामंडल विधान में 280 अर्घ्य चढ़ाए गए। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान के अभिषेक, शांति धारा, मुनि श्री के पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट दीप प्रज्ज्वलन, चित्र अनावरण करने का सौभाग्य भक्तामर महामंडल विधान के पुण्यार्जक पंकज, प्रियंका, प्रियंक, प्रज्वलन जैन को प्राप्त हुआ। इसके बाद नित्य नियम पूजन के साथ भक्तामर महामंडल विधान में गुरुवार को कुल 34 काव्यों के साथ 1904 अर्घ्य समर्पित किए गए।

भजनों पर नाचते श्रद्धालु।
हम सभी दूसरों के सुख से दु:खी
मुनि पूज्य सागर जी महाराज ने कहा कि आज हम जो कपड़े पहन रहे, जो खाना खा रहे, वह भी दूसरों के लिए कर रहे हैं। घर में तो हम बनियान में भी रह जाते हैं, अपना काम कर लेते हैं। 10 व्यक्ति सूखी रोटी खाते हैं एक साथ तो वह भी खाने में आनंद आता है पर दस में एक घी वाली रोटी खा ले तो अब वह सूखी रोटी अच्छी नहीं लग रही है, क्योंकि एक घी वाली खा रहा है। आज हमारे बच्चे तो अपनी संस्कृति और संस्कार भूल कर पाश्चात्य संस्कृति में जी रहे हैं, उसी को स्टैंडर्ड मानकर जी रहे हैं, पर वास्तव में तो यह हो रहा कि हम अपनी संस्कृति और संस्कारों को नष्ट करते जा रहे हैं। आज न तो पहने और खाने का कोई ढंग रहा है और न माता-पिता के प्रति आदर सत्कार रहा और न ही सम्मान। आज तो यह भी कह देते हैं कि हम अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं, जमाना बदल गया है, हम अपने हिसाब से जीना चाहते हैं। दूसरे देश की संस्कृति और संस्कार के कारण क्या हो रहा। पहले हम एक सूत्र में बंधे थे। एक साथ 50 लोग रहते थे और एक रसोई में खाना बनता था, एक-दूसरे का आदर करते थे, परिवार की मर्यादा का ध्यान रखते थे, एक- दूसरे के दुख में एक दूसरे के साथ खड़े रहते थे। अब तो एक घर में रहकर भी एक- दूसरे के प्रति मर्यादा, सहयोग जैसे भाव ही नहीं रहे, बस अपने लिए जीना चाहते हैं।
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