मध्यप्रदेश

Amazing artwork; Same mannequin, new look | कभी राम तो कभी बन जाते हैं श्याम, थीम के आधार पर बदल देते हैं मुद्राएं

इंदौरएक घंटा पहले

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इस बार 28 सितम्बर को अनंत चतुर्दशी पर निकलने वाली झांकियों की तैयारियां जोरों पर हैं। तीन दिन शेष रहने के चलते झांकी कलाकार दिन-रात काम में जुटे हैं। चूंकि समय कम बचा है इसके चलते समय पर झांकियों को पूरा करना चुनौती भरा है। बीते सालों में झांकियों के बनाने के तरीकों में भी कुछ बदलाव आया है। एकदम नई प्रकार और नई थीम की झांकियों में तो नए पुतले (डमी) बनाकर उसे मूर्त रूप दिया जाता है। इसी तरह स्मार्ट कलाकारी के तहत पुराने पुतलों को नए चेहरे लगाकर उनकी मुद्राएं बदल दी जाती है। हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है।

पुतलों का ऐसा बदल जाता है स्वरूप।

पुतलों का ऐसा बदल जाता है स्वरूप।

इन दिनों हुकुमचंद, स्वदेशी, कल्याण, राजकुमार, मालवा मिल, भण्डारी (होम टेक्सटाइल) आदि मिलों के परिसर में झांकियां बनाने का काम चल रहा है। कलाकारों के मुताबिक सालों पहले झांकियों को बनाने में काफी समय लगता था। तब राखी के बाद से ही झांकियां बनाने का काम शुरू हो जाता था।

कम संसाधन, सीमित डेकोरेशन सामग्री के बीच अब काफी बदलाव आया है। तीन दशक से मिलें बंद होने से झांकियां बनाने के लिए आर्थिक परेशानी रहती है। हर साल नगर निगम, आईडीए व अन्य माध्यमों से मदद मिलने से झांकियों का सिलसिला जारी है। पहले एक मिल की पांच-छह झांकियां निकलती थी अब दो से चार झांकियां निकलती है।

पुतलों को रखा जाता है सुरक्षित

कलाकार छोटे पुतलों को कभी दरबान तो कभी बना देते हैं सैनिक।

कलाकार छोटे पुतलों को कभी दरबान तो कभी बना देते हैं सैनिक।

झांकी निर्माता और कलाकारों के मुताबिक हर साल झांकियां निकलने के बाद सारी विद्युत सज्जा हटाने के बाद पुतलों को टिन शेड या सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाता है। इस दौरान इनके चेहरे अलग रख दिए जाते हैं। इन पुतलों का रंग सालभर में रंग उड़ जाता है। फिर भी ये पुतले अगली झांकियों के बेस के लिए काफी सहायक होते हैंं।

दो दशक से झांकियां बना रहे कलाकार अखिलेश पुन्यासी के मुताबिक पुराने पुतलों को थीम अनुसार नया रूप दिया जाता है। जैसे कोई पुतला जो झांकी में गरबा नृत्य करते हुए बालिका का था, उसे जरूरत के हिसाब से कृष्ण लीला में गोपी या अन्य रूप दिया जाता है।

ऐसे बदल दिया जाता है पूरा स्वरूप

अभी पूरी सजावट बाकी।

अभी पूरी सजावट बाकी।

कलाकार अखिलेश ने बताया कि पिछली झांकी में मानो उसके साथ नीचे होकर उसके हाथों में डांडिया थे, अगली झांकी में वही पुतलों के हाथ नए बनकर उसे नृत्य करते हुए बताए जाते हैं। ऐसे ही चेहरे भी बदलकर उसकी भी मुद्राएं बदल जाती है। फिर रंगों-रोगन और वस्र पहनाने के बाद पुतलों का पिछले साल का रूप बदलकर एकदम नया रूप हो जाता है। इस बार वे एक पुराने पुतले का चेहरा हटाकर उनके स्थान पर नंदबाबा का चेहरा बनाकर लगाने में जुटे हैं। ऐसे ही पुतलों के पुराने हाथ हटाकर नई स्टेप वाले हाथ बना रहे हैं।

जानवरों के पुतलों में भी कुछ ऐसा ही

भगवान के वाहकों को ऐसा दिया जाता है नया रूप।

भगवान के वाहकों को ऐसा दिया जाता है नया रूप।

अधिकांश धार्मिक झांकियों में कभी नंदी, कभी मयूर, कभी चूहा, कभी गरुड आदि को भी बड़ी खूबसरती के साथ सजाया जाता है। पशु-पक्षी के इन पुराने पुतलों को भी झांकी की जरूरत और भगवान के वाहन के लिहाज से उसका चेहरा और स्वरूप बदल दिया जाता है। वैसे अधिकांश झांकियों में छोटे पुतले को गोपियां, दरबान, सैनिक, नृत्य कलाकार, ग्वाला आदि का रूप दिया जाता है।

नई थीम और कैरेक्टर के लिए तैयार होते हैं नए बड़े पुतले

बड़े नए पुतले होते हैं तैयार।

बड़े नए पुतले होते हैं तैयार।

कलाकार शंभूराव सुखटनकर के मुताबिक नई थीम में अगर पुतला एकदम बड़ा चाहिए और उसके साथ का माहौल कुछ अलग दिखाना तो फिर नए पुतले बनाकर उसे संबंधित कैरेक्टर का रूप दिया जाता है। हालांकि एक बार बड़ा पुतला तैयार होने के बाद फिर वह आने वाले सालों में किसी अन्य रूप के लिए भी काम आ जाता है। फिर भी इनके लिए सभी कलाकारों को काफी मेहनत करती पड़ती है। इसमें रंग सज्जा, विद्युत सज्जा, वस्त्र सज्जा, वाहन सज्जा सभी से जुड़े कलाकार पूरी जज्बे के साथ जुटे रहते हैं।

100 साल पुरानी बैलगाड़ी व लालटेन वाली झांकी आएगी नजर

100 साल पुरानी झांकी की दिखेगी झलक।

100 साल पुरानी झांकी की दिखेगी झलक।

खास बात यह कि इस बार हुकुमचंद मिल की झांकी का यह 100 साल है। नरेंद्र श्रीवंश (प्रधानमंत्री, हुकुमचंद गणेशोत्सव समिति) ने बताया कि मिल बंद होने के 32 साल बाद भी यह गौरवशाली परम्परा जारी है। इस बार की झांकी इसलिए भी खास है कि 1923 में झांकियों की शुरुआत सर हुकुमचंद सेठ ने शुरू की थी। तब पहली बार बैलगाडी, मशाल व लालटेन में झांकियां निकाली गई थी।

इस बार की झांकी में हम लोगों को बताएंगे कि तब इस पुराने स्वरूप में कैसे झांकियां निकली थी। यह झांकी अपने आप में अद्बभुत होगी। दूसरा यह कि 2023 में इस बार चंद्रयान भारत की बड़ी उपलब्धि है। यह झांकी भी रहेगी यानी तब से लेकर अब तक का समावेश रहेगा। दो धार्मिक झांकियों में एक कंस वध व दूसरी वामन अवतार वाली रहेगी।

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एडवोकेट अरविन्द जैन

संपादक, बुंदेलखंड समाचार अधिमान्य पत्रकार मध्यप्रदेश शासन

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