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भारत का दूसरा ऐसा मामला जिसमें बच पाए बच्चे, मां ने दम तोड़ते हुए कहा- बच्चों को बचा लेना | MP 1st case, 24 week old baby, stayed on ventilator for 32 days, now recovered in 100 days

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भोपाल5 मिनट पहले

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भोपाल में करीब 5 महीने पहले 1 मां ने 2 जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था। लेकिन मां कुछ दिन बाद ही अपने कलेजे के टुकड़ों को छोड़कर अलविदा कह गई। दोनों बच्चे बेहद कमजोर थे। 4-5 महीने तक डॉक्टर्स बच्चों को बचाने में लगे रहे। शनिवार को उन्हें डिस्चार्ज किया गया, जिसके लिए अस्पताल में एक भव्य कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। जिसमें विधायक रामेश्वर शर्मा शामिल हुए। डॉक्टर ने पिता को बधाई देते हुए बच्चों को परिजनों को सौंप दिया।

मामला शहर के बंसल अस्पताल का है। यहां पेशे से गायक रहीं दीप्ति परमार ने 24 हफ्ते के जुड़वा बच्चों को बीते साल 14 नंवबर को जन्म दिया। चूंकि, डिलीवरी 6 महीने में हुई, इसलिए डॉक्टर्स के पास मां और बच्चों में से किसी 1 को ही चुनना था। लेकिन दीप्ति ने डॉक्टर्स से कहा- मुझे नहीं मेरे बच्चों को बचा लो। इन 6 महीनों में दीप्ति को जॉन्डिस भी हुआ और उनकी एक किडनी भी फेल हो गई थी। बच्चों को इलाज के लिए प्रोफेसर कॉलोनी स्थित बांबे चिल्ड्रन हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। हॉस्पिटल के डॉयरेक्टर डॉ. राहुल अग्रवाल ने बताया कि लविक और रवीश अब पूरी तरह से स्वस्थ्य हैं। हालांकि, जब उनका जन्म हुआ था, तब वे काफी कमजोर थे। उनका वजन मात्र 410 ग्राम था। 100 दिन तक चले इलाज के बाद शनिवार को दोनों बच्चों को हॉस्पिटल से डिसचार्ज कर दिया। अब दोनों बच्चे दो – दो किलोग्राम के हो गए हैं।

प्रीमैच्योर डिलवरी का कारण

दीप्ति के पति शेलेंद्र परमार ने बताया कि करीब आठ साल पहले दीप्ति का किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था। उनकी मां ने उन्हें किडनी दी थी। जिसके स्वस्थ होने के बाद हमने प्रेग्नेंसी प्लान की और प्रेग्नेंसी के दौरान दीप्ति की हालत खराब होने लगी तब जाकर हमें पता चला कि उनको किडनी की दिक्कत के अलावा जॉन्डिस भी है। जिसके चलते बच्चों की प्रीमैच्योर डिलेवरी की गई। बता दें कि दीप्ति शहर की जानी मानी क्लासिकल सिंगर थीं।

32 और 35 दिन तक वेंटिलेटर पर रहे दोनों बच्चे

डॉ. राहुल अग्रवाल ने बताया कि दीप्ति की प्रीमैच्योर डिलीवरी से जन्में जुड़वा लविक और लवीश जब पैदा हुए, तब उनका वजन 490 ग्राम था। लेकिन, फैंफड़े, ब्रेन और आंते पूरी तरह विकसित नहीं हुए थे। करीब 10 दिन तक दोनों बच्चे बंसल हॉस्पिटल में रहें। इस दौरान दोनों बच्चों का वजन घटता गया। तभी परिजनों ने लविक और लवीश को इलाज के लिए प्रोफेसर कॉलोनी स्थित बांबे चिल्ड्रन हॉस्पिटल में भर्ती कराया। यहां लविक 32 दिन और लवीश 35 दिन तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहा। वेंटिलेटर पर ट्रीटमेंट के दौरान कई मर्तबा दोनों की सेहत बिगड़ी। लेकिन, दुआओं और दवाओं से बच्चों ने इन मुश्किलों को मात दे दी।

वार्ड में भर्ती दूसरे नवजात बच्चों की मां का दूध दिया

बांबे चिल्ड्रन हॉस्पिटल में भर्ती लविक और लवीश का मां की दिसंबर के पहले सप्ताह में मल्टी आर्गन फेलियर से मौत हो गई। लेकिन, नवजात के लिए अमृत कहा जाने वाला मां का दूध दोनों बच्चों को नहीं मिला। इन हालात में दोनों बच्चों को फीड कराने के लिए मदर मिल्क, बांबे चिल्ड्रन हॉस्पिटल में भर्ती दूसरे नवजात बच्चों की मांओं ने दिया।

प्रदेश का पहला मामला

डॉ. राहुल ​​अग्रवाल ने बताया कि 26 हफ्ते से कम प्रेगनेंसी में नवजात को बचाना संभव नहीं होता। मैं खुद भी अपने पिछले 18 साल की जर्नी की बात करूं तो ऐसे 20-21 बच्चे ही हैं, जो बच पाए हैं। डॉक्टर राहुल अग्रवाल का दावा है कि यह प्रदेश का पहला और देश दूसरा मामला है। जिसमें 24 हफ्ते के दो जुड़वा बच्चों को बचाया गया। उन्होंने बताया कि इससे पहले अमेरिका में दुनिया का सबसे कम समय के बच्चे को बचाया गया था। जिसकी आयु 22 हफ्ते 1 दिन थी। फिर इस तरह का मामला भारत में 23 हफ्ते 3 दिन का है और अब यह प्रदेश का पहला मामला है, जहां 24 हफ्ते की गर्भावस्था वाली महिला की डिलीवरी से हुए दो जुड़वा बच्चे इलाज से स्वस्थ हुए।

मां ने वीडियो कॉल पर देखा था बच्चों को

बच्चों के पिता शेलेंद्र परमार ने बताया कि दोनों बच्चों के पैदा होने के कुछ दिनों बाद दीप्ति इस दुनिया से चली गई। इस दौरान बच्चों को तो उसने नहीं देखा। हालांकि, उनको वीडियो कॉल पर दीप्ति ने देखा था। जब हालत बहुत गंभीर हो गए तब डॉक्टर्स ने कहा कि हम या तो बच्चों को बचा सकते हैं या फिर मां को, तब दीप्ति ने खुद कहा कि बच्चों की जान बचाओ बस।

अस्पताल की दूसरी प्रसूताओं ने पिलाया दूध

डॉक्टर राहुल अग्रवाल ने बताया कि इस दौरान हमें एक तरफ इन्हें इंफेक्शन से बचाना था, क्योंकि इतने छोटे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम होती है। साथ ही इनके फीड (दूध) को लेकर शुरुआत में यहां मौजूद दूसरी प्रसूताओं ने इन्हें दूध पिलाया। इस दौरान इनकी लेजर थैरेपी भी की गई क्योंकि आम तौर पर इतने छोटे बच्चों के साथ लंग्स और रेटीनौपैथी ऑफ प्रीमैच्युरिटी जैसी दिक्कत का सामना भी करना पड़ता है।

हमारे लिए अभी तक का सबसे बड़ा चैलेंज

हॉस्पिटल की नर्सिंग स्टाफ सुमन राठौर जो इन बच्चों की हर समय देखभाल कर रहीं थीं। उन्होंने बताया कि यह हमारे लिए अभी तक का सबसे बड़ा चैलेंज था। हमारी पूरी कोशिश थीा की बच्चों को किसी भी तरह बचाया जाए। इस बीच में राहुल से हार नहीं मानी और वह लगातार इन बच्चों का ट्रीटमेंट आदि करते रहे। साथ ही इनके परिवार के लोगों ने हौसला बनाए रखा।

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Arvind Jain Editor, Bundelkhand Samchar
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