मध्यप्रदेश

They go to a village 1 km away to charge their mobile | मोबाइल चार्ज करने जाना पड़ता है 1 किमी दूर: चूल्हे की रोशनी में पढ़ाई, बुधनी के गांव में 30 साल से बिजली नहीं – Madhya Pradesh News

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ये कहते हुए सविता बाई हाथ जोड़ लेती है। चेहरे पर ऐसे भाव है जैसे इस बात को वो कई बार दोहरा चुकी हो। दरअसल, सविता बाई कोलिया बेदरा टोला की रहने वाली है। सीहोर जिले के जाट मुहाई गांव में आने वाले इस टोला में 19 आदिवासी परिवार रहते हैं। जिन्हें पिछले 30 साल से बिजली का इंतजार है।

बता दें कि जाट मुहाई गांव सीहोर जिले के बुधनी विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है। जहां से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 6 बार विधायक रहे हैं। कोलिया बोदरा टोला गांव से 1 किमी दूर बसा है। गांव वालों का कहना है कि पूर्व सीएम से भी वे कई बार बिजली की मांग कर चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

आखिर इस टोले तक बिजली पहुंचने में क्या दिक्कतें है, लोग किस तरह से अंधेरे में रहने को मजबूर है? ये जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम राजधानी भोपाल से 145 किमी दूर जाट मुहाई गांव के पास बने आदिवासियों के इस टोले में पहुंची। यहां लोगों से बात करने के साथ जिम्मेदारों से भी बात की। पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट

जाट मुहाई गांव में भरपूर बिजली और पानी भास्कर की टीम सबसे पहले जाट मुहाई ग्राम पंचायत पहुंची। ये बुधनी विधानसभा का सबसे आखिरी गांव है। इसके बाद देवास जिले की खातेगांव विधानसभा शुरू हो जाती है। गांव में बिजली पानी की सुविधा है। सड़कें भी सीमेंट की बनी है। इसी गांव का हिस्सा है कोलिया बेदरा मजरा टोला। यहां आदिवासी परिवारों के खेत हैं।

वे अपने खेत में ही मकान बनाकर रहते हैं। जब भास्कर की टीम यहां पहुंची तो गांव में सन्नाटा था। गांव के एक बुजुर्ग से पूछा कि बाकी के लोग कहां है, तो उन्होंने सभी को बुलाया। कुछ ही देर में वहां 25 से 30 लोग इकट्ठा हो गए। इनमें महिलाएं भी शामिल थीं। गांव के लोगों से बातचीत की तो पता चला कि तीस साल पहले तक ये मुहाई गांव में ही रहते थे, लेकिन खेती की जमीन यहां होने की वजह से यहां आकर बस गए।

कोलिया बेदरा टोला में आदिवासियों ने खेतों में ही मकान बनाए हैं।

कोलिया बेदरा टोला में आदिवासियों ने खेतों में ही मकान बनाए हैं।

सिंचाई के लिए करते हैं डीजल पंप का इस्तेमाल टोला के मोहन उइके ने बताया कि पहले तो उनके बाप-दादा पुराने तरीके से खेती करते थे। सिंचाई के लिए बारिश पर ही निर्भर रहते थे, लेकिन अब खेती के लिए पानी की जरूरत पड़ती है। हमारे टोले में पिछले कई सालों से बिजली नहीं है।

उनसे पूछा कि सिंचाई के लिए क्या करते हैं? उइके ने बताया कि डीजल पंप से सिंचाई करते हैं। अब डीजल इतना मंहगा हो गया है कि खेती की लागत तक नहीं निकल पाती। मोहन उइके की बात को आगे बढ़ाते हुए बर्जर सिंह कहते हैं कि हमारे घरों के लिए बिजली मत दो, लेकिन खेतों के लिए तो सरकार कनेक्शन दे।

सिंचाई के लिए आदिवासी डीजल पंप का इस्तेमाल करते हैं।

सिंचाई के लिए आदिवासी डीजल पंप का इस्तेमाल करते हैं।

पूर्व सीएम शिवराज को कई बार आवेदन दिया बर्जर सिंह ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हमारे यहां से विधायक रहे हैं। पिछली बार चुनाव के दौरान जब वो यहां आए तो उन्हें हाथ में आवेदन दिया था। अब और क्या कर सकते हैं ? मामा ने आवेदन पत्र लिया, लेकिन कुछ नहीं किया।

बर्जर सिंह से पूछा कि पहली बार कब आवेदन दिया था, तो बोले- ऐसा तो याद नहीं मगर पांच छह बार तो दे चुके हैं। 25 साल का शैतान सिंह इसी बात से नाराज है। वह कहता है कि हमें देखने के लिए कोई नहीं आता। सालों तक ऐसे ही पड़े रहते हैं, जब चुनाव आता है तब नेता वोट मांगने टोले तक पहुंच जाते हैं। आश्वासन देते हैं, बाद में कोई ध्यान नहीं देता।

बिजली के लिए पंचायत से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक गांव के लोग आवेदन दे चुके हैं।

बिजली के लिए पंचायत से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक गांव के लोग आवेदन दे चुके हैं।

महिलाएं बोलीं- अंधेरे में खाना बनाने में दिक्कत टोले के लोगों से बातचीत के दौरान ही हल्का सा अंधेरा गहराने लगा था। बातचीत में महिलाएं भी शामिल थीं। बिजली न होने से उनकी अलग परेशानियां हैं। सविता बाई बताती है कि दिन के उजाले में सारे काम निपटाने के बाद रात में दिक्कतें शुरू होती है। सबसे ज्यादा दिक्कत तो खाना पकाने में होती है।

सारा काम मशाल की रोशनी में करते हैं। यहां किसी भी मकान में शौचालय की सुविधा नहीं है, लिहाजा गांव के लोग खुले में शौच के लिए जाते हैं। महिलाएं कहती हैं कि रात के वक्त खेत में जाना खतरे से खाली नहीं होता। किसी कीड़े-मकोड़े या बिच्छू पर पैर पड़ जाए, तो अंधेरे में ही डॉक्टर के पास भागना पड़ता है।

बच्चे बोले- चूल्हे की रोशनी में पढ़ते हैं

टोले में रहने वाले आदिवासी बच्चों से पूछा कि उन्हें बिजली न होने से क्या दिक्कतें होती हैं, तो आठ साल का अरुण बोला- मां जब चूल्हा जलाती है, तभी पढ़ाई हो पाती है। उसी के पास बैठा अनिकेत बोला- मैं तो स्कूल से आने के बाद ही होमवर्क करने बैठ जाता हूं। अभी तो गर्मियां शुरू हो गई है इसलिए सूरज देर से ढलता है।

अनिरुद्ध कहता है कि सबसे ज्यादा परेशानी ठंड के दिनों में होती है। सूरज जल्दी ढलता है और देर से सुबह होती है। उसके पास ही बैठा नीलेश कहता है कि रात में तो कीड़े मकोड़े भी आते हैं। होमवर्क निपटाने के बाद हम लोग कुछ देर खेलते हैं। जैसे ही रात होती है मां बाहर निकलने नहीं देती।

आदिवासी बच्चे चूल्हे की रोशनी में पढ़ाई करते हैं।

आदिवासी बच्चे चूल्हे की रोशनी में पढ़ाई करते हैं।

होश संभालते ही अंधेरा देखा गांव के लोग बताते हैं कि कुछ बुजुर्ग जो अब इस दुनिया से रुख़सत हो चुके हैं, उन्होंने पूरी जिंदगी में बिजली की रोशनी नहीं देखी। 12 वीं में पढ़ने वाला योगेश कहता है कि मैंने तो बचपन से अपने घर में बिजली का बल्ब नहीं देखा। आज 18 साल का हो चुका हूं। मैंने गांव वालों को कई बार नेताओं और अधिकारियों को आवेदन देते जरूर देखा है।

योगेश के पास स्मार्ट फोन है। उससे पूछा कि इसे चार्ज कैसे करते है?, तो उसने बताया कि 1 किमी दूर मुहाई गांव में दोस्तों के घर चला जाता हूं। वहां एक दो घंटे समय बिताते हैं। फोन भी चार्ज करते हैं। उससे पूछा कि बिना फोन के नहीं रह सकते क्या?

वह बोला- रात के वक्त यदि किसी के साथ कुछ अप्रत्याशित हो जाए तो कम से कम संपर्क के लिए फोन तो जरूरी है। इसके जरिए दूसरे गांव वालों से संपर्क बना रहता है। उसी के पास खड़ा दुर्गेश कहता है- आजकल बिना फोन के क्या काम होता है, आप बताइए?

आदिवासी युवकों के पास स्मार्ट फोन है, जिसे चार्ज करने के लिए वे दूसरे गांवों में जाते हैं।

आदिवासी युवकों के पास स्मार्ट फोन है, जिसे चार्ज करने के लिए वे दूसरे गांवों में जाते हैं।

सरपंच बोला- कई बार वन विभाग को आवेदन दिया जाट मुहाई ग्राम पंचायत के सरपंच भवानी सिंह तोमर से जब इस बारे में पूछा तो सरपंच ने कहा कि 6 महीने पहले वन विभाग के डिप्टी रेंजर ओम गोयल को आवेदन दिया था, क्योंकि कोलिया बेदरा टोला वनग्राम का हिस्सा है। इससे पहले जब हमने पटवारी को आवेदन दिया था, तो उन्होंने बताया कि वन विभाग की मंजूरी के बाद ही यहां बिजली की व्यवस्था हो सकती है।

सरपंच से कहा कि गांव वालों का आरोप है कि आप मदद नहीं करते? इस पर भवानी सिंह ने कहा कि यदि मैं मदद नहीं करता तो आवेदन लेता ही नहीं। कोई भी बहाना बना सकता था। अपनी बात को साबित करने के लिए सरपंच ने भास्कर की टीम के सामने ही रेंजर को फोन लगाया और स्पीकर ऑन किया।

दूसरी तरफ से रेंजर ने कहा कि अपनी तरफ से जानकारी बिजली विभाग को भेज दी गई है। सीहोर में बिजली विभाग से जानकारी लो।

अब जानिए क्या कहते हैं जिम्मेदार

बिजली विभाग के अफसर बोले- जब पैसा आएगा तब काम होगा कोलिया बेदरा टोला में बिजली क्यों नहीं पहुंच सकी है? ये पता करने भास्कर की टीम सबसे पहले पहुंची गोपालपुर विद्युत स्टेशन। यहां से जाट मुहैया समेत आसपास के गांवों को बिजली सप्लाई की जाती है।गोपालपुर स्टेशन के जूनियर इंजीनियर मोहम्मद सादिक कुरैशी से इस बारे में पूछा तो बोले- सरकार तो बिजली पहुंचा रही है। जिस टोले की आप बात कर रहे हैं उसका भी प्रस्ताव बना होगा।

अब तक वहां बिजली क्यों नहीं पहुंची इसके बारे में पता करेंगे। भास्कर ने पूछा कि क्या आप वहां कभी गए हैं? तो कुरैशी ने कहा- नहीं मैं वहां नहीं गया। बोले -हम तो कनेक्शन देने के लिए बैठे हैं, यदि कोई अप्लाई करेगा तो आगे की कार्रवाई करेंगे। भास्कर ने उन्हें बताया कि टोले में रहने वाले लोग कई बार आवेदन दे चुके हैं, तो खुद को बचाते हुए बोले- मैडम मुझे यहां आए केवल तीन महीने ही हुए हैं।

वहीं इस मामले में विद्युत वितरण कंपनी के जीएम जाहिद खान ने बताया-

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आदिम जाति कल्याण विभाग से विद्युतीकरण के लिए पैसे की मांग की गई है। जब पैसा मिलेगा तब काम शुरू होगा। अब तक ये टोला उनकी स्कीम में शामिल नहीं था, इस बार इसे शामिल किया गया है। जब तक फंड नहीं मिलेगा तब तक काम शुरू नहीं हो पाएगा।

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वन विभाग पौधे लगा सकता है, बिजली नहीं पहुंचा सकता भास्कर ने वन विभाग के रेंजर ओम गोयल से बात की, तो वे बोले कि कोलिया बेदरा टोला वन एरिया में आता है, लेकिन बिजली पहुंचाने का काम वन विभाग नहीं कर सकता। हमारा काम वनों की रक्षा और पेड़ों का संरक्षण है। पिछले कई सालों से इस टोले में बिजली नहीं है, इसके पीछे क्या कारण है मुझे नहीं पता? गोयल ने बताया-यहां रहने वाले कुछ लोगों को साल 2020 में वन अधिकार पट्टा मिला है। जिन्हें पांच साल हो गए उन्हें इस आधार पर बिजली मिल सकती है।

कलेक्टर ने टीम भेजकर रिपोर्ट मंगाई इस मामले में सीहोर कलेक्टर जी. बाला गुरू से बात की तो उन्होंने पहले कहा कि वो इस मामले में जांच करा कर ही कुछ कह सकते हैं। दूसरे दिन कलेक्टर ने अपनी एक टीम भेजकर यहां सर्वे कराया। टीम ने जो रिपोर्ट कलेक्टर को दी है उसके मुताबिक 19 परिवार झोपड़ियों में रहते हैं। जिसमें से 9 के पास वन विभाग के पट्टे नहीं है।

यहां बिजली पहुंचाने के लिए 11 केवी की पौने दो किमी लंबी लाइन डालने की जरूरत है। एक 63 केवी और एक 25 केवी का ट्रांसफॉर्मर और 2 किमी लंबी एलटी लाइन बिछाने की जरूरत होगी। इस काम में 30 लाख रु. की लागत आएगी। रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि 27 दिसंबर 2024 को डीजीएम ने आदिवासी विकास लघु परियोजना के अधिकारी से फंड की मांग की थी, जो उन्हें नहीं दिया गया है।

ऊर्जा मंत्री बोले- मैं हैरान हूं, जांच करवाता हूं

भास्कर ने ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर से भी बात की। तोमर ने कहा कि ऐसा कैसे संभव है। केंद्र ने सौ फीसदी विद्युतीकरण के लिए राज्यों को फंड दिया है। जहां तक मेरी जानकारी में है कि मप्र के सभी गांवों में सौभाग्य योजना के तहत बिजली पहुंचाई जा चुकी है। यदि कोई टोला रह गया है तो मैं कलेक्टर से बात करूंगा। वहां बिजली पहुंचाने में क्या दिक्कतें है उनसे जानकारी लेकर आगे की कार्रवाई करेंगे।


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एडवोकेट अरविन्द जैन

संपादक, बुंदेलखंड समाचार अधिमान्य पत्रकार मध्यप्रदेश शासन

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