ढोल की थाप पर लाठियों का अचूक वार : मोनी अमावस्या पर भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा ये अनोखा मौनिया दिवारी नृत्य…VIDEO

छतरपुर। लाठियों का अचूक वार करते हुए युद्ध कला को दर्शाने वाला मौनिया नृत्य बुंदेलखण्ड की सबसे प्राचीन नृत्य शैली है जिसे दिवारी नृत्य भी कहा जाता है। मोर पंख और लाठी लिए हुए दीपोत्सव पर्व मनाने की यह अनूठी परम्परा सिर्फ़ बुंदेलखंड की दीपावली में ही देखने को मिलती है, यहां के तीज, त्यौहार, नृत्य एवं बुंदेलखण्डी गाने सभी का मन मोह लेती हैं उन्हीं में से एक मौनिया नृत्य। बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में यह नृत्य दीपावली के दूसरे दिन मौनी अमावस्या को पुरुषों द्वारा किया जाता है वैसे तो धनतेरस से लेकर दीपावली की दूज तक गांव गांव में दिवारी नृत्य खेलते नौजवानों की टोलियां घूमती देखी जाती हैं। दिवारी खेलने वाले लोग इस कला को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ग्वालों को सिखाई गई आत्म रक्षा की कला मानते हैं।
वीरता का पुट लिए अलग तरह से बज रही ढोलक की थाप खुद ब खुद लोगों को थिरकने पर मजबूर कर देती है। अलग वेश भूषा, मोर पंख और लाठी के साथ मौनिया टोली जब दिवारी लोक नृत्य खेलते हुए जिमनास्टिक खिलाडी की तरह अदभुत करतब दिखाती है तो चाहे बूढा हो या बच्चा या फिर जवान सभी थिरकने को मजबूर हो जाते है।
पारंपरिक लोकनृत्य में पुरूषों द्वारा घेरा बनाकर मोर के पंखों और लठ्ठ को लेकर बड़े ही मोहक अंदाज में नृत्य किया जाता है। बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों के लोगों के मौन होकर मौन परमा के दिन इस नृत्य को करने से इस नृत्य का नाम मौनिया नृत्य रखा गया।
गणेशपुरा गाँव के रहने वाले मौनिया रामस्वरूप, कन्हैया और रामू बताते हैं कि मौनिया नृत्य करने के पहले सभी श्रृंगार करते हैं। बाद में गाँव के मंदिर में जाकर व्रत धारण कर पूरे दिन किसी से बात नहीं करते सिर्फ मौनिया नृत्य करते हैं। शाम होने के बाद यह व्रत खोला जाता है। जिस गाँव की मौनिया नृत्य की टोली एक बार व्रत रख ले तो वह बारह वर्ष तक अनवरत करना पड़ता है। मौनिया नृत्य की गायन मंडली मौन धारण नहीं करती बाकी सभी मौन धारण करते हैं। दीपावली के दिन जटाशंकर मंदिर में माथा टेकने के बाद हमारी टोली प्रण के अनुसार 11 या इससे अधिक गाँवों या मोहल्लों में घूमकर मौनिया नृत्य करते हुए आज छतरपुर टौरिया हाउस पहुंची है, टौरिया हाउस में कांग्रेस की प्रदेश सचिव समाजसेविका अंजना चतुर्वेदी के यहां हम कई वर्षों से आ रहे हैं, नृत्य के बाद पारंपरिक तरीके से अंजना चतुर्वेदी द्वारा मोनिया टोली का माथे पर तिलक लगाकर मिठाई बांटी गई और पुरूस्कार प्रदान किया गया।