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न्यायिक कार्य करते समय मजिस्ट्रेट अगर कोई आदेश देता है, तब वह कब अपराध की श्रेणी में नहीं आता है जानिए/IPC…

पिछले लेख में हमने आपको बताया था कि अगर किसी तथ्यों की भूल से किसी व्यक्ति से कोई अपराध हो जाता है तब उसे धारा 76 के अंतर्गत क्षमा कर दिया जाता है। अगर कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट किसी अपराधी को मृत्यु दण्ड की सजा का आदेश दे देता है एवं फांसी होने के बाद पता चले कि व्यक्ति निर्दोष था तब क्या उसकी मृत्यु का जिम्मेदार न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट होगा? आज की धारा-77 में हम आपको बताए कि उपर्युक्त धारा आपराधिक निर्णय में न्यायधीश का किस प्रकार संरक्षण करती है जानिए।


★भारतीय दण्ड संहिता,1860 की धारा-77 की परिभाषा:-★
अगर कोई न्यायिक कार्यवाही करते हुए मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश विधि को ध्यान में रखते हुए या पालन करते हुए कोई ऐसा निर्णय देता है जिससे की व्यक्ति निर्दोष हो लेकिन सबूतों या साक्ष्यो के आधार पर दोषी पाया जाता है, तब मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश का निर्णय जो लिखित या मौखिक हो किसी भी प्रकार से अपराध नहीं होगा।

नोट:- लेकिन सिविल न्यायालय के मजिस्ट्रेट को इस धारा के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त नहीं है उनको  न्यायिक अधिकारी संरक्षण अधिनियम,1850 के अंतर्गत इस प्रकार का संरक्षण प्राप्त होगा।


:- लेखक बी. आर. अहिरवार(पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665

एडवोकेट अरविन्द जैन

संपादक, बुंदेलखंड समाचार अधिमान्य पत्रकार मध्यप्रदेश शासन

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