Ananda Bose Vs Mamata Banerjee now? Bengal governor and government fight on principal secretary | अब आनंद बोस Vs ममता बनर्जी? प्रिंसिपल सेक्रेटरी पर बंगाल गवर्नर और सरकार आमने-सामने

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल आनंद बोस।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में राज्यपाल आनंद बोस की प्रिंसिपल सेक्रेटरी नंदिनी चक्रवर्ती को बदलने के प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार और राजभवन में गतिरोध बढ़ गया है। राज्य सचिवालय से अभी तक ऐसा कोई इशारा नहीं मिला है कि नंदिनी चक्रवर्ती को बदलने के राजभवन के अनुरोध को स्वीकार किया जाएगा या नहीं। तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष का एक बयान साफ इशारा करता है कि राज्य की सत्ताधारी पार्टी इस घटनाक्रम से खुश नहीं है।
‘…तब तक हमारी ओर से शिष्टाचार होगा’
घोष ने कहा, ‘सीवी आनंद बोस को उन्हीं लोगों ने पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया है जिन्होंने पहले जगदीप धनखड़ को बनाया था। काम करने के तरीके में अंतर होने के बावजूद उनकी जड़ें समान हैं। इसलिए, यह सोचना गलत होगा कि बोस और धनखड़ के टारगेट अलग-अलग होंगे। जब तक राज्यपाल कानूनी प्रावधानों के अनुसार काम करते हैं और शिष्टाचार का माहौल बनाए रखते हैं, तब तक हमारी ओर से भी शिष्टाचार रहेगा। लेकिन अगर राज्यपाल राज्य सरकार के खिलाफ अपनी सीमा से बाहर जाकर काम करते हैं, तो प्रतिक्रिया बदल जाएगी।’
‘शक पैदा होगा कि पर्दे के पीछे चल रहा है’
इस बीच, राज्य सरकार के सूत्रों ने कहा कि नंदिनी चक्रवर्ती के साथ राजभवन का झगड़ा तब शुरू हुआ जब चक्रवर्ती ने राज्यपाल के लिए एक कंसल्टिंग कमिटी के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी देने से इनकार कर दिया। आनंद बोस की पसंद तमिलनाडु कैडर के एक पूर्व IAS अधिकारी और एक पूर्व IPS अधिकारी थे जिन्होंने CBI के विशेष निदेशक और दिल्ली पुलिस के आयुक्त के रूप में भी काम किया है। घोष ने कहा कि अगर इस कारण से चक्रवर्ती को हटाया जाना है, तो यह शक जरूर पैदा होगा कि पर्दे के पीछे कुछ चल रहा है।
‘…तो हमारी तरफ से भी प्रतिक्रिया अलग होगी’
तृणमूल प्रवक्ता ने कहा कि अगर राज्यपाल दूसरे राज्यों के IPS अधिकारियों को अलग तरीके से इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं, तो हमारी तरफ से भी प्रतिक्रिया अलग होगी। इस बीच तृणमूल कांग्रेस पर राज्यपाल का अपमान करने का आरोप लगाते हुए भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने कहा कि सत्तारूढ़ दल ने कभी भी संवैधानिक जरूरतों की परवाह नहीं की और वह इस बार भी वही कर रही है।
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