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आपकी नजर में नहीं है दादी-नानी की कोई कीमत, यहां 8 घंटे के लिए आया पर खर्च होते हैं 23 लाख मंथली!

भारत की परिवार और समाज व्यवस्था अद्भुत है. लेकिन, तथाकथित आधुनिकता के नाम पर हम इस खूबसूरत व्यवस्था को खत्म कर रहे हैं. हमें नहीं पता कि इस व्यवस्था के खत्म हो जाने के बाद समाज-परिवार पर क्या असर पड़ेगा. मौजूदा वक्त में हमारे परिवारों में दादी-नानी की अहमियत दिन प्रति दिन घटती जा रही है. आधुनिक पीढ़ी उन्हें बेकार समझने लगी है. लेकिन, आज की इस कहानी में आपको इनकी कीमत का पता चलेगा.

दरअसल, यह कहानी सात समंदर पार दक्षिण कोरिया की है. इस मुल्क ने कम समय में बेहद तेज आर्थिक प्रगति की है. इसका प्रतिकूल असर यह हुआ है कि युवा पीढ़ी का परिवार नामक संस्था से भरोसा उठ गया है. ये बच्चे पैदा नहीं करना चाहते हैं. यहां प्रति महिला फर्टिलिटी रेट मात्र 0.72 हैं. इसको इस तरह से समझ सकते हैं कि 100 महिलाओं पर केवल 72 बच्चे हैं.

इस कारण यहां की आबादी पर संकट मंडराने लगा है. सरकार आबादी बढ़ाने के लिए कई तरह की इंसेंटिव दे रही है. लेकिन, इसका कोई असर नहीं हो रहा.

महिलाएं मां बनना क्यों नहीं चाहती हैं? इसका मुख्य कारण हैं कि यहां की अधिकतर दंपति कामकाजी हैं. उनके बच्चों को पालने वाला कोई नहीं है. दूसरी तरह अगर ये दंपति बच्चों को पालने के लिए कोई आया रखते हैं तो वे उनकी सैलरी नहीं दे पाते हैं. क्योंकि यहां के नियम कड़े हैं और देश में आया का काम करने वाली महिलाओं की भारी कमी है.

दक्षिण कोरिया के नियमों के मुताबिक आठ घंटे के लिए आया की सैलरी 23.8 लाख वोन देने पड़ते हैं. वोन दक्षिण कोरिया की मु्द्रा है. भारतीय रुपये में यह राशि करीब 1.5 लाख रुपये बैठेगी. यह खर्च यहां एक परिवार की औसत आय का करीब आधा है. इस तरह ये परिवार अगर 16 घंटे के लिए आया रखें तो इनके पास खाने के लिए पैसे नहीं बचेंगे. यानी एक बच्चे को पालने के लिए ऐसे परिवारों को भारतीय रुपये में करीब 3 लाख मंथली खर्च करने पड़ेंगे. ऐसे में आपको अब अपने भारतीय परिवारों में दादी-नानी की कीमत का पता चल गया होगा.

284 अरब डॉलर का पैकेज
सरकार ने देश में फर्टिलिटी बढ़ाने के लिए अब तक 284 अरब डॉलर खर्च कर चुकी है. बावजूद इसके स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है. ऐसे में सरकार अब विदेशी आया हायर करने को मंजूरी देने जा रही है. इसके तहत अगले साल के मध्य तक फिलिपींस से करीब 1200 आया को हायर किया जाएगा. इनकी सैलरी अपेक्षाकृत कम रहती है.

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एडवोकेट अरविन्द जैन

संपादक, बुंदेलखंड समाचार अधिमान्य पत्रकार मध्यप्रदेश शासन

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