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बचपन में बोरे पर बैठकर करते थे पढ़ाई, अब बन गए हैं बड़े डॉक्टर, जानें इनके संघर्ष की कहानी

Agency:News18 Bihar

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डॉ. अनिल कुमार ने छपरा के अनवल देवरिया गांव से संघर्षमय यात्रा शुरू की और पीएमसीएच से मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बने. अब वे अपनी जन्मभूमि में रहकर लोगों की सेवा कर रहे हैं.

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घर के थी माली हालत, फिर भी पिता ने पुत्र को बनाया डॉक्टर

हाइलाइट्स

  • डॉ. अनिल कुमार ने संघर्ष से डॉक्टर बनने का सफर तय किया.
  • बचपन में बोरे पर बैठकर पढ़ाई की, अब छपरा में सेवा कर रहे हैं.
  • पीएमसीएच से मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर जन्मभूमि में सेवा कर रहे हैं.

छपरा के एक ऐसे चिकित्सक की कहानी आज हम आपको बताने जा रहे हैं, जिनकी संघर्ष यात्रा सुनकर आप भावुक हो जाएंगे. हम बात कर रहे हैं जलालपुर प्रखंड के अनवल देवरिया गांव निवासी डॉ. अनिल कुमार की, जिनकी शिक्षा की शुरुआत इसी गांव के एक प्राइमरी स्कूल से हुई थी. यह वही स्कूल था, जहां मात्र दो कमरे हुआ करते थे और उन्हीं दो कमरों में कक्षा एक से पांच तक की पढ़ाई के साथ-साथ कार्यालय का संचालन भी होता था.

बच्चों की संख्या अधिक थी, लेकिन कमरे कम होने के कारण मास्टर साहब चौक से जमीन पर चिन्ह खींचकर कक्षाओं का बंटवारा कर देते थे. एक ही कमरे में एक तरफ एक कक्षा और दूसरी तरफ दूसरी कक्षा के बच्चे मुंह घुमा कर बैठते थे. जब बच्चों की संख्या और अधिक हो जाती थी, तो पास की बांसवाड़ी में क्लास लगाई जाती थी, जहां बच्चे अपने घर से बोरा और झोला लेकर आते थे. झोले में किताबें रहती थीं और बोरा बिछाकर बच्चे पढ़ाई किया करते थे.

डॉ. अनिल कुमार भी इसी बोरा पर बैठकर पढ़ते हुए छपरा कॉलेज तक पहुंचे और फिर पटना के पीएमसीएच से मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बन गए. आज वे अपनी जन्मभूमि को ही अपनी कर्मभूमि बनाकर लोगों की सेवा कर रहे हैं.

लोकल 18 से बातचीत में डॉ. अनिल कुमार ने बताया, “मेरी कहानी हजारों बच्चों की कहानी है. मेरी यात्रा भी एक छोटे से परिवेश से शुरू हुई है, जैसे कई अन्य बच्चों की होती है. संयोगवश, मैं अपने इस छोटे से सफर से आगे बढ़कर आज आप सबके सामने हूं. मेरा गांव अनवल देवरिया, जो कोपा सम्होता के समीप स्थित है, वहीं से मैंने जीवन की यात्रा शुरू की. इसी गांव के प्राइमरी स्कूल से मेरी पढ़ाई का सफर आरंभ हुआ, जहां हम बसवारी में बोरा बिछाकर पढ़ाई किया करते थे.”

उन्होंने आगे बताया, ‘जब मैं कोपा हाई स्कूल पहुंचा, तो पहली बार बेंच पर बैठने का मौका मिला. वह अनुभव मेरे लिए अविस्मरणीय था. ऐसा लगा जैसे मैं किसी हवाई जहाज में बैठा हूं. वह दिन जब भी याद आता है, मेरी आंखें आंसुओं से भर जाती हैं.’

डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि उनके पिता एक छोटी सी नौकरी करते थे, जिससे घर का खर्च चलाना मुश्किल होता था. फिर भी, वे अपनी क्षमता के अनुसार बच्चों की पढ़ाई पर पैसा खर्च करते थे. स्कूल जाने के लिए उन्हें रोज़ दो-तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. जब छपरा कॉलेज में नामांकन हुआ, तो किसी से लिफ्ट लेकर या गाड़ियों पर लटककर कॉलेज पहुंचते थे। इसके बाद उन्होंने पटना से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की.

उन्होंने बताया, ‘इसी दौरान मेरी नौकरी लग गई, लेकिन मेरा गांव मुझे हमेशा याद आता था. क्योंकि जब मैं पढ़ने जाता था, तो गांव के लोग मुझे पहचानते थे और मेरी मदद भी किया करते थे. उन यादों को संजोए रखते हुए मैंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अपनी जन्मभूमि को ही अपनी कर्मभूमि बनाने का निर्णय लिया. 2007 से मैं छपरा में रहकर लोगों की सेवा कर रहा हूं और यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है’.

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बचपन में बोरे पर बैठकर करते थे पढ़ाई, अब बन गए हैं बड़े डॉक्टर, जानें कहानी


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एडवोकेट अरविन्द जैन

संपादक, बुंदेलखंड समाचार अधिमान्य पत्रकार मध्यप्रदेश शासन

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