क्या 24 साल के बाद ‘ब्रांड मोदी’ की खनक कम हो गई? | – News in Hindi

मोदी का भाव गिर गया है. बिहार में एनडीए 30-32 के बीच सिमट जाएगा. आप सोच रहे होंगे ये भविष्यवाणी किसने की होगी. दो फेज की वोटिंग के बाद जेडीयू विधायक गोपाल मंडल ने ये बात कही थी. ये बिहार के भागलपुर से विधायक हैं. ये तो बीजेपी के सहयोगी हैं. खुद राजनाथ सिंह ने धनबाद की रैली में कहा – इधर उधर मत देखिए. ये देखिए वोट कहां जाएगा. दरअसल पार्टी प्रत्याशी ढुल्लू महतो के खिलाफ कई आपराधिक मामले हैं और जनता खुश नहीं है, ये बात ऊपर तक पहुंच गई. तो राजनाथ जी ये जता रहे थे कि वोट मोदी को जाएगा. ये दो उदाहरण है. गोपाल मंडल के मुताबिक ब्रांड मोदी की चमक फीकी पड़ रही है. राजनाथ सिंह के मुताबिक मोदी मैजिक बरकरार है. और गिनती नहीं कराऊंगा क्योंकि तारकिशोर प्रसाद से लेकर देश भर के बीजेपी नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर मोदी के नाम पर वोट मांगा. ब्रांड मोदी में भरोसा रखने वालों का मानना था कि उम्मीदवार गौण है. वोट तो मोदी के चमत्कारिक चेहरे पर पड़ेगा. पूरी पार्टी ने संकल्प पत्र को भी इसी दिशा में मोड़ दिया. मोदी की गारंटी. इसने ब्रांड मोदी बनाम पूरे विपक्ष यानी इंडी गठबंधन के बीच लड़ाई करा दी. जब लोकसभा चुनाव के नतीजे सामने आए तो बीजेपी बहुमत के आंकड़े से 32 सीट पीछे छूट गई. यानी 24 साल के बाद ब्रांड मोदी की चमक फीकी पड़ गई.
ये स्वाभाविक भी है. गुजरात के सीएम रहते डेवलपमेंट मॉडल से वो ब्रांड मोदी बने. हिंदुत्व की चासनी के साथ ब्रांड मोदी ने 2014 में बीजेपी की जीत तय कर दी. लेकिन दो दशकों के बाद कोई भी पॉलिटिकल ब्रांड वोटरों की थकान का शिकार होगा ही. इसे समझने में पोल मैनेजर्स ने गलती की होगी क्योंकि कई रिपोर्ट्स ऐसी आईं, जिनमें कहा गया कि खुद मोदी ने कार्यकर्ताओं और नेताओं से स्थानीय मुद्दों पर फोकस करने को कहा है. लेकिन 2014 के मुकाबले 2019 में मिले बेहतर जनादेश के बाद 2024 में भी उम्मीद थी कि पूरे देश में मोदी लहर होगी. इस तरह की कोई सुनामी थी ही नहीं. नतीजों से साफ है कि हिंदी पट्टी के सूबों में वहां के स्थानीय मुद्दे हावी रहे. चुनाव के दौरान पीटीआई ने जब नरेंद्र मोदी से पूछा कि आप ब्रांड मोदी कैसे बने तो उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों से जनता ने जो उन पर भरोसा किया है, उसी से ऐसा हुआ है.
उम्मीदवारों का विरोध
अगर उन्हीं की बातों पर भरोसा करें तो ये मान सकते हैं कि वोटिंग सिर्फ मोदी के नाम पर नहीं हुई. न ही उनकी गारंटी का असर हुआ. इसके उलट कहीं अग्निपथ का विरोध, कहीं पेपर लीक का मुद्दा, कहीं महंगाई तो कहीं रोजगार और सबसे ज्यादा उम्मीदवार के खिलाफ लहर ने बीजेपी को परेशान किया. बीजेपी ने राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 40 परसेंट सीटिंग सांसदों के टिकट काटे तो यूपी में सिर्फ 14 नए कैंडिडेट आए और बिहार में दो के टिकट बदले गए. लगातार तीसरी बार जनता का सामना सिर्फ ब्रांड मोदी के नाम पर करना आसान नहीं था. दस साल का हिसाब जनता लेने के मूड में थी.
बाद के अंतिम तीन चरणों में 400 पार को संविधान से छेड़छाड़ और आरक्षण खत्म करने की साजिश के तौर पर विपक्ष ने परोस दिया. यूपी-बिहार में ये जमीन पर उतर गया. इसकी काट के लिए बीजेपी ने हिंदु -मुस्लिम का जो खेल खेला, उसने ब्रांड मोदी को और नुकसान पहुंचा दिया. इसे मोदी ने खुद हवा दी. उन्होंने रैली दर रैली ये कहा कि इंडी गठबंधन दलितों और ओबीसी से आरक्षण छीन कर मुसलमानों को देना चाहती है. अब पता चल रहा है कि दलितों और ओबीसी ने यूपी जैसे राज्य में अखिलेश की झोली भर दी. इसका मतलब ये भी नहीं निकाल सकते कि वोटर्स मोदी का विरोध कर रहे थे.
लोकल अंडरकरेंट
दरअसल, जब कोई लहर न हो तब अंडरकरेंट लोकल हो जाता है. हिंदुओं को डराने या पीओके वापस लेने का दांव भी काम नहीं करता. अब आप ऐसे समझिए कि बीजेपी के वोट शेयर में महज 0.7 परसेंट की गिरावट आई है. 2019 में 37.3 परसेंट था जो 36.6 परसेंट हो गया, लेकिन इसने 63 सीटें घटा दीं. अब इसी वोट औसत को राज्यों के हिसाब से देखेंगे तो खेला का पता चलेगा. तमिलनाडु बीजेपी का वोट शेयर तीन परसेंट से दहाईं में चला गया, लेकिन कोई सीट नहीं मिली. पश्चिम बंगाल में 1.5 परसेंट घटा तो छह सीटें घट गईं.
बिहार में 23.6 से 20.5 हुई तो पांच सीटें हार गईं. सबसे जबर्दस्त नुकसान तो महाराष्ट्र में दिखा जहां बीजेपी का वोट शेयर 27.6 परसेंट था. इस बार घट कर 26.2 हो गया तो बीजेपी आधी हो गई. 23 से घटकर 10 पर सिमटना पड़ा. इसी तरह कांग्रेस का वोट शेयर महाराष्ट्र में सिर्फ एक परसेंट बढ़ा लेकिन सीटें एक से बढ़कर 13 हो गईं. राजस्थान में 34 से 37 हुई तो खाता ही नहीं खुला बल्कि कांग्रेस आठ पर जीत गई. महाखेला तो यूपी में अखिलेश ने खेला, जिन्होंने 2019 में मायावती के साथ मिलकर 37 परसेंट वोट हासिल किया लेकिन सिर्फ 15 सीटें मिलीं. इस बार कांग्रेस के साथ 43 परसेंट वोट शेयर रहा तो बीजेपी हाफ होकर 33 पर सिमट गई. उधर समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें लेकर 43 परचम लहरा दिया. खेल हुआ सपा के वोट शेयर में. जिस मायावती ने 2019 में लगभग 22 परसेंट वोट पाए वो घटकर 9 परसेंट पर आ गया. वहीं समाजवादी पार्टी का वोट शेयर 18 से उछलकर 33.5 परसेंट हो गया. इससे साफ है कि बसपा के वोटर अखिलेश की तरफ शिफ्ट हो गए. उधर 50 परसेंट का नारा बुलंद कर उसे हासिल करने वाली बीजेपी 41.3 परसेंट पर सिमट गई.
मतलब ब्रांड मोदी का टेस्ट या तो हो ही नहीं रहा था या मोदी मैजिक फेल हो रहा था. मोदी ने यूपी और बिहार में जितना समय दिया, दिन-रात एक कर दिए, उसमें ये कहना ठीक नहीं होगा कि ब्रांड मोदी का टेस्ट नहीं हो रहा था. जब पीएम खुद ही अपनी गारंटी से वोट मांग रहे हों तो आप समझ सकते हैं. पर, अंतिम चरण में 12 करोड़ लोगों के घर पीने का पानी, उज्ज्वला योजना , आवास , जीडीपी के बदले आरक्षण बचाने और उसे मुसलमानों को देने की साजिश पर जोर देना गलत साबित हो गया. इसने ब्रांड मोदी को डेंट किया, ये मेरा मानना है. उधर, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जातीय गणना और संविधान की रक्षा पर फोकस करते रहे. पीडीए और सरकारी नौकरियों को मुद्दा बनाते रहे.
अब मोदी नए जनादेश के मुताबिक सरकार चलाने वाले हैं. सहयोगियों के समर्थन पर निर्भर रहना है. उनके लिए ये पहला अनुभव है. चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार और शिंदे के समर्थन से पांच साल सरकार चलानी है. हो सकता है देश अब नया मोदी देखेगा.
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