मध्यप्रदेश

Voting analysis of 29 seats of MP | MP की 29 लोकसभा सीटों का एनालिसिस: 23 सीटों पर कम वोटिंग, पिछले चुनाव के मुकाबले 4% घटी; किसे फायदा किसको नुकसान

भोपालकुछ ही क्षण पहलेलेखक: राजेश शर्मा

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मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव के चौथे और आखिरी चरण में करीब 72 फीसदी वोटिंग हुई है। जो पिछले चुनाव के मुकाबले 4 फीसदी कम है। इस चरण की आठ सीटों में से सबसे कम 60.53 फीसदी वोटिंग इंदौर लोकसभा सीट पर हुई है। वहीं सबसे ज्यादा वोटिंग अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित खरगोन लोकसभा सीट पर 75.79 फीसदी हुई है

वहीं, चौथे चरण की इन 8 संसदीय क्षेत्र में आने वाली 64 विधानसभा सीटों में 5 महीने पहले हुए चुनाव से 7 फीसदी कम वोटिंग हुई है। इनमें 46 सीटों पर भाजपा के और 17 सीटों पर कांग्रेस के विधायक हैं। जबकि एक सीट सैलाना भारत आदिवासी पार्टी के खाते में है।

मध्यप्रदेश में अब सभी 29 लोकसभा सीटों पर चुनाव हो चुके हैं। 29 सीटों का एनालिसिस किया जाए तो 2019 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 23 सीटों पर वोटिंग घटी है। जबकि 6 सीटों पर मतदान ज्यादा हुआ है। जिन सीटों पर मतदान ज्यादा हुआ है उनमें तीन वीआईपी सीट विदिशा, राजगढ़ और गुना शामिल है। वहीं जिन 23 सीटों पर मतदान कम हुआ है, उनमें सबसे ज्यादा सीधी सीट पर पिछले चुनाव के मुकाबले 13 फीसदी मतदान घटा है।

प्रदेश की सभी 29 सीटों पर मतदान की स्थिति साफ हो चुकी है। पिछली बार के मुकाबले 4 फीसदी कम वोटिंग के क्या मायने है ? ये जानने के लिए हमने बीते 3 आम चुनाव के वोटिंग पर्सेंट के रुझान देखे। एक्सपर्ट से समझने की कोशिश की है कि वोटिंग बढ़ने या कम होने से किसे फायदा होगा ?

पढ़िए, हर सीट पर पिछले लोकसभा-विधानसभा चुनाव के मुकाबले कितना कम-ज्यादा रहा वोटिंग प्रतिशत…

2019 लोकसभा के मुकाबले 4 फीसदी, विधानसभा के मुकाबले 7 फीसदी कम वोटिंग

वोटिंग खत्म होने के बाद शाम 7 बजे निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक सबसे कम वोटिंग इंदौर में 60.53 फीसदी हुई है। जो पिछले चुनाव की तुलना में करीब 8 फीसदी कम है। विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से देखें तो इंदौर में इस लोकसभा चुनाव में 17 फीसदी कम वोटिंग हुई है। विधानसभा चुनाव में इस लोकसभा की सभी आठ सीटों पर 78.92 फीसदी मतदान हुआ था।

वहीं सबसे ज्यादा 75.79 फीसदी वोटिंग खरगोन लोकसभा सीट पर हुई है। हालांकि ये भी पिछले लोकसभा चुनाव से 2 फीसदी कम है। विधानसभा चुनाव में इस लोकसभा की सभी आठ सीटों पर 79.5 फीसदी मतदान हुआ था। इस हिसाब से भी देखें तो इस लोकसभा चुनाव में 4 फीसदी कम वोटिंग हुई है।

प्रदेश की 29 सीटों पर 4 फीसदी कम मतदान को लेकर राजनीतिक विश्लेषक एन के सिंह का कहना है कि चुनाव में कोई ज्वलंत मुद्दे न तो सरकार के खिलाफ और न ही सरकार के पक्ष में थे। यह ट्रेंड केवल मध्य प्रदेश में नहीं, बल्कि कई राज्यों में है।

उन्होंने कहा- जिन सीटों पर वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है, वह हाई प्रोफाइल सीटें हैं। इन सीटों पर दमदार प्रत्याशी हैं। शिवराज हों या सिंधिया सभी ने अपने स्तर पर वोटिंग बढ़ाने के प्रयास किए हैं। इससे लगता है कि शायद उनके पक्ष में वोटिंग प्रतिशत बढ़ा होगा।

इंदौर में सबसे कम वोटिंग को लेकर सिंह कहते है कि भाजपा ने जिस तरह से नोटा के कैंपेन को लेकर रिएक्ट किया है, उससे लगता है कि नोटा का इस सीट पर असर हुआ है। जो वोटर अपने आप को ठगा महसूस करते हैं और जिस तरह से आया राम गया राम की स्थिति बनी है। उससे वोटर्स ने नोटा का विकल्प ज्यादा चुना है।

अब सीट वार पढ़िए, वोटिंग प्रतिशत घटने से किस सीट पर क्या बन रहे हैं समीकरण…

देवास: लोकसभा के मुकाबले 4 %, विधानसभा के मुकाबले 11 % कम मतदान

इस सीट पर पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले औसतन करीब 4 फीसदी कम मतदान हुआ है। यहां मुख्य मुकाबला भाजपा के महेंद्र सिंह सोलंकी और कांग्रेस के राजेंद्र मालवीय के बीच है। इस लोकसभा क्षेत्र में आने वाली 8 विधानसभा सीटों पर पिछले विधानसभा चुनाव से 11 फीसदी कम वोटिंग हुई है।

इसमें उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार का विधानसभा क्षेत्र शुजालपुर भी शामिल है। इस संसदीय क्षेत्र की सभी आठ विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। इसमें सबसे कम वाटिंग देवास में हुई है।

उज्जैन: मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में सबसे कम वोटिंग

इस सीट से तराना से कांग्रेस विधायक महेश परमार और भाजपा के सांसद अनिल फिरोजिया के बीच मुकाबला है। विधासभा चुनाव में यहां की 6 सीटें भाजपा और 2 सीटें कांग्रेस ने जीती थी। लोकसभा चुनाव में 2.37फीसदी कम वोटिंग हुई है।

यहां सबसे कम वोटिंग उज्जैन दक्षिण में 65.5 फीसदी हुई। यहां से मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव विधायक हैं। विधानसभा से तुलना करें तो यहां 5 फीसदी वोट कम पड़े। जबकि सबसे अधिक घटि्टया में 75.71 फीसदी वोट पड़े, लेकिन विधानसभा की तुलना में यह 6 फीसदी कम है। यहां से भाजपा के सतीश मालवीय विधायक हैं।

मंदसौर: वित्त मंत्री देवड़ा के क्षेत्र में सबसे अधिक वोटिंग

मंदसौर संसदीय क्षेत्र में सबसे अधिक 75.08 फीसदी वोट मल्हारगढ़ में पड़े। यहां से वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा विधायक हैं। हालांकि विधानसभा की तुलना में यह आंकड़ा 11 फीसदी कम है। इस सीट के अंतर्गत आने वाली 8 में से 7 सीटें भाजपा के कब्जे में हैं।

इनमें से सबसे कम वोटिंग 68.48 फीसदी गरोठ में हुई। जो विधानसभा की तुलना में 13 फीसदी कम है। इस सीट पर भाजपा सांसद सुधीर गुप्ता और कांग्रेस के दिलीप सिंह गुर्जर के बीच मुकाबला है।

रतलाम: विक्रांत भूरिया के मुकाबले नागर सिंह की सीट पर 2 फीसदी ज्यादा वोटिंग

रतलाम सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया और भाजपा की अनीता सिंह चौहान के बीच में है। अनीता, डॉ. मोहन सरकार में वन मंत्री नागर सिंह चौहान की पत्नी हैं। चौहान अलीराजपुर से विधायक हैं। इस लोकसभा चुनाव में सभी आठ विधानसभाओं में सबसे कम वोटिंग जोबट में हुई है।

महिला बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया के क्षेत्र पेटलवाद में 72.65 फीसदी वोट पड़े। जो विधानसभा की तुलना में 6 फीसदी कम हैं। इसी तरह रतलाम सिटी में 69.13 फीसदी वोटिंग हुई। यहां से मंत्री चेतन काश्यप मंत्री हैं। यहां विधानसभा में 73.49 फीसदी वोट पड़े थे।

धार: बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस विधायकों के क्षेत्र में ज्यादा वोटिंग

इस सीट पर भाजपा की सावित्री ठाकुर का मुकाबला कांग्रेस के राधेश्याम मुवेल से है। इस सीट पर पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में 3 फीसदी वोटिंग कम हुई है। जबकि विधानसभा से तुलना करें तो 10 फीसदी कम वोटिंग हुई। यहां की 8 में से 3 विधानसभा सीटों पर भाजपा और 5 सीट पर कांग्रेस का कब्जा है।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के विधानसभा क्षेत्र गंधवानी में विधानसभा की तुलना में 5 फीसदी वोट कम पड़े। धार में सबसे कम वोटिंग महू सीट पर हुई है। यहां 61 फीसदी वोट पड़े। बीजेपी की ऊषा ठाकुर यहां से विधायक हैं।

इंदौर: कैलाश से ज्यादा सिलावट के क्षेत्र में वोटिंग

इस संसदीय क्षेत्र की सभी 8 विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। चौथे चरण में जिन आठ संसदीय क्षेत्र में वोटिंग हुई। उनमें से सबसे कम 60.53 फीसदी वोट इंदौर में पड़े हैं। जबकि यहां कांग्रेस मुकाबले में नहीं थी। पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार 12 फीसदी वोट कम पड़े है, तो विधानसभा की तुलना में 17 फीसदी कम वोटिंग हुई हैं।

यहां से कैलाश विजयवर्गीय और तुलसी सिलावट मंत्री हैं। इस चुनाव में कैलाश से ज्यादा सिलावट के क्षेत्र में वोटिंग हुई। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के इंदौर-1 क्षेत्र में 55.75 फीसदी, जबकि मंत्री तुलसी सिलावट के क्षेत्र सांवेर में 62.05 फीसदी वोट पड़े।

खरगोन: सबसे ज्यादा वोटिंग, लेकिन विधानसभा से 8 फीसदी कम

चौथे चरण की 8 सीटों में सबसे ज्यादा खरगोन में 75.79 फीसदी वोटिंग हुई। लेकिन यह पिछले लोकसभा की तुलना में इस बार 2 फीसदी कम हुई। यहां 2019 में 77.82 फीसदी वोट पड़े थे। इस सीट पर भाजपा के गजेंद्र सिंह और कांग्रेस के पोरलाल परते के बीच मुकाबला है। विधानसभा में 8 में से 5 सीटें कांग्रेस और 3 सीटें भाजपा ने जीती थीं।

विधानसभा चुनाव से तुलना करें तो यहां 8 फीसदी वोट कम पड़े हैं। कांग्रेस विधायक सचिन यादव की कसरावद विधानसभा क्षेत्र में 13 फीसदी वोटिंग कम हुई है।

खंडवा: सभी 8 विधानसभा क्षेत्रों में घटी वोटिंग, सबसे ज्यादा मंधाता में

इस सीट पर भाजपा सांसद ज्ञानेंद्र पाटिल और कांग्रेस के नरेंद्र पटेल के बीच में है। यहां पिछले लोकसभा की तुलना में इस बार 8.02 फीसदी वोट कम पड़े। यहां की आठ में से 7 सीटों पर भाजपा का कब्जा है।

पांच महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव की तुलना में यहा सभी विधानसभा क्षेत्र में औसतन 8.22 फीसदी वोट कम पड़े। सबसे ज्यादा मंधाता में 11.79 फीसदी वोटिंग कम हुई। यहां से भाजपा के विधायक नारायण पटेल हैं।

शिवराज ने सिंधिंया को पीछे छोड़ा, दिग्वजय की सीट पर 1.65 ज्यादा वोटिंग

प्रदेश की 29 सीटों में से मात्र 6 सीटें ऐसी हैं, जहां वोटिंग बढ़ी है, जबकि 23 सीटों पर घटी है। सबसे ज्यादा वोटिंग विदिशा में 2.69 % बढ़ी है। यहां से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चुनाव मैदान में हैं। वोटिंग ट्रेंड के मामले में उन्होंने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को पीछे छोड़ दिया है। गुना में पिछले चुनाव की तुलना में इस बार 2.11 फीसदी ज्यादा वोट पड़े हैं।

जिन छह सीटों पर वोटिंग ज्यादा हुई है, उनमें राजगढ़ भी शामिल है। यहां से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह चुनाव मैदान में है। राजगढ़ में पिछले चुनाव की तुलना में इस बार 1.65 फीसदी वोट ज्यादा पड़े हैं। सागर व भिंड में भी वोटिंग पर्सेंट बढ़ा है। लेकिन, 1 फीसदी से भी कम। जिन 23 सीटों पर वोटिंग घटी है, उसमें सीधी सबसे ऊपर है। यहां पिछले चुनाव की तुलना में सबसे ज्यादा 13 फीसदी वोट कम पड़े हैं।

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एडवोकेट अरविन्द जैन

संपादक, बुंदेलखंड समाचार अधिमान्य पत्रकार मध्यप्रदेश शासन

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