Ganapath Review: मसाला एंटरटेनर के नाम पर सिर्फ एक्शन की चटनी? पढ़ें कैसी है टाइगर श्रॉफ कृति सेनन की फिल्म

Ganapath Movie Review: टाइगर श्रॉफ और कृति सेनन ‘हीरोपंति’ के बाद एक बार फिर ‘गणपत’ के जरिए साथ आए हैं. इस बीच कृति सेनन नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली एक्ट्रेस बन चुकी हैं, वहीं टाइगर भी एक्टिंग के स्कूल में ‘स्टूडेंट’ बन शायद काफी कुछ सीख चुके हैं. ‘गणपत’ से उम्मीदें बढ़ भी इसलिए जाती हैं, क्योंकि इस फिल्म के निर्देशन की कमान ‘क्वीन’, ‘चिल्लर पार्टी’ और ‘सुपर 30’ जैसी बढ़िया फिल्में बना चुके डायरेक्टर विकास बहल ने संभाली है. देखिए टाइगर श्रॉफ हैं, तो ये तय है कि फिल्म में एक्शन की ओवरडोज तो होगी. लेकिन क्या ये फिल्म कृति सेनन, अमिताभ बच्चन जैसे एक्टरों के लिए भी कुछ कर पाई है? क्या इस फिल्म को भी आपको यही कहकर बेचा जाएगा कि ‘दिमाग घर पर रखकर जाएं, तो मजा आएगा…? आइए बताती हूं कैसी है ये फिल्म.
क्या कहती है कहानी
सबसे पहले समझ लें कि इस फिल्म की कहानी क्या है. विकास बहल की ये फिल्म डायस्टोपियन एक्शन फिल्म है, जो एक काल्पनिक समय की कहानी को पर्दे पर उतारती है. इस फिल्म में ये काल्पनिक समय है युद्ध के बाद बर्बाद हो चुकी दुनिया का. कहानी शुरू होती है दलपति (अमिताभ बच्चन) से. युद्ध के बाद पूरी तरह बर्बाद हो चुकी दुनिया 2 हिस्सों में बंट गई है. एक है अमीरों की दुनिया यानी ‘सिल्वर सिटी’, जहां गरीबों के लिए कोई जगह नहीं है. वहीं अमीरों की दुनिया से इतर ये गरीब हर जरूरत की चीज के लिए आपस में लड़ते हैं. लेकिन दलपति उन्हें लड़ाई के लिए एक जगह देता है, जो है बॉक्सिंग रिंग. लेकिन सिल्वर सिटी का दालिनी गरीबों के इस हालात में भी बिजनेस देखता है और उन्हें सिल्वर सिटी में ले जाता है. इस बॉक्सिंग पर वह बेटिंग लगाकर पैसा कमाता है. सिल्वर सिटी और गरीबों की इसी दुनिया के खाई जैसे अंतर को पाटने का काम करेगा गुड्डू (टाइगर श्रॉफ) जो आगे जाकर ‘गणपत’ बन जाता है. इस पूरे काम में जस्सी (कृति सेनन) उसका पूरा साथ देती है.
भारत की कहानी में चाइनीज
देखिए कहानी जितने प्यार से और आसानी से मैंने आपको समझा दी, वो मेरा गुण है, लेकिन इसे इतनी सरलता से समझाने का काम ये फिल्म नहीं कर पाई है. ऐसा मैं इसलिए कह रही हूं कि कहानी कई जगह बिना सिर-पैर की लगने लगती है. यहां तक की इंडिया की कहानी में चाइनीज और यूरोप के गावों जैसे दिखने वाला मंजर कहां से आ जाता है, मराठी गुड्डू का पंजाबी दादा दलपति अटपटा सा लगता है और ऐसा ही बहुत कुछ आपको लॉजिक से परे लगेगा. कहानी में कई चीजें कन्फ्यूज करने वाली हैं. विकास बहल ने इस डायस्टोपियन फिल्म के जरिए एक काल्पनिक लोक की कहानी दिखाई है, लेकिन ये कल्पनाएं इतनी घिसी-पिटी हैं कि क्या बताएं.
ये तर्क भी दिया जा रहा है कि ये डायस्टोपियन कहानी कहने की नई कोशिश है. लेकिन इससे पहले नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज ‘लैला’ और अरशद वारसी स्टारर वेब सीरीज ‘असुर’ ऐसी ही भविष्य की दुनिया को दिखा चुकी है. हॉलीवुड फिल्म ‘अवतार’ इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जिसे भारत में भी खूब पसंद किया गया. डायस्टोपियन सिनेमा की पहली शर्त है कि आप दर्शकों को भरोसा दिलाएं कि आप जो दुनिया दिखा रहे हैं वो सच्ची और लॉजिकल है, तभी आपकी कहानी पर भरोसा होगा. लेकिन ‘गणपत’ इसी भरोसे में फेल है. विकास एक बढ़िया निर्देशक हैं, जिनसे एक बढ़िया फिल्म की उम्मीद थी, लेकिन लगता है वो भी टाइगर के एक्शन वाले अंदाज की हवा में बह गए हैं. एक्शन इतना ज्यादा खींचा गया है कि क्या कहें. दूसरा कहानी में सब की Chess गेम की तरह सब कुछ या तो काला या सफेद है. अमीर मतलब बहुत बुरा, गरीब मतलब बहुत अच्छा. ऐसे में कहानी की पर्तें हैं ही नहीं. हालांकि इंटरवेल एक बढ़िया ट्विस्ट पर होता है, लेकिन सेकंड हाफ में उसे संभाला नहीं गया.
फिल्म ‘गणपत: अ हीरो इज बॉर्न’ 20 अक्टूबर को रिलीज हो गई है.
‘मसाला एंटरटेनमेंट’ के नाम पर चटनी नहीं चलेगी
फिल्म की कहानी और उसका ट्रीटमेंट इसकी सबसे बड़ी कमजोर कड़ी है. वहीं कृति सेनन और अमिताभ बच्चन जैसे सितारों का अभिनय इसे कुछ देर तक देखने लायक बना पाते हैं. दिक्कत है कि टाइगर को पहली ही फिल्म से लेकर अभी तक, बस एक्शन के जरिए ही बेचा जा रहा है. लेकिन अब ये एक्शन भी वो एक्साइटमेंट पैदा नहीं कर पाता क्योंकि ये सब तो हम पहले ही देख चुके हैं. एक्शन तो अब शाहरुख खान भी कर रहे हैं और आदित्य रॉय कपूर भी. तो आखिर इस बासे माल को कब तक पैकेट बदल कर बेचने की कोशिश की जाती रहेगी. दिक्कत ये है कि दर्शकों ने धीरे-धीरे बॉलीवुड पर फिर से भरोसा करना शुरू किया है और उसका श्रेय ‘गदर 2’ और ‘ओएमजी 2’ और ‘जवान’ जैसी फिल्मों को जाता है. लेकिन जब ‘मसाला एंटरटेनमेंट’ के नाम पर सिर्फ एक्शन की चटनी पेश कर देंगे तो कैसे चलेगा? चटनी किसी खाने का स्वाद बढ़ा सकती है, पर पूरा खाना नहीं हो सकती. वैसे ही एक फिल्म को सिर्फ एक्शन-एक्शन कर नहीं बेचा जा सकता जब उसकी आसली आत्मा यानी कहानी में इतनी ढील हो.
एक्टिंग का मैं पहले ही जिक्र कर चुकी हूं कि कृति हाल ही में राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हैं और अमिताभ बच्चन को अभिनय के लिए अब क्या ही आंका जाए. टाइगर की बात करें तो उनका मुंबई टपोरी अंदाज ठीक था, पर अब उन्हें कुछ नया करना चाहिए. हालांकि ये कहने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए कि एक्शन में टाइगर शानदार रहे हैं. म्यूजिक फिल्म का अच्छा है. फुट टैपिंग नंबर हैं, बैकग्राउंड म्यूजिक पर बात हो सकती है. मेरी तरफ से इस फिल्म को 2 स्टार.
डिटेल्ड रेटिंग
कहानी | : | |
स्क्रिनप्ल | : | |
डायरेक्शन | : | |
संगीत | : |
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Tags: Amitabh bachchan, Kriti Sanon, Tiger Shroff
FIRST PUBLISHED : October 20, 2023, 12:00 IST
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