Effect of Karnataka’s victory in MP | वहां कांग्रेस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जीती तो शिवराज ने 130 अफसरों के खिलाफ मुकदमा चलाने की दी अनुमति

भोपाल34 मिनट पहलेलेखक: राजेश शर्मा
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मध्यप्रदेश में दो महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए शिवराज सरकार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। यही कारण है कि शिवराज सरकार को जो भी मुद्दा मिलता है, उसे एजेंडे में शामिल कर लेती है। कर्नाटक में भाजपा ने हिंदूवाद और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर मुखर होकर चुनाव लड़ा था, लेकिन लोगों ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार वाले मुद्दे को वोट दिया। इसके बाद शिवराज सरकार सचेत हुई। भाजपा ने तेजी से मप्र में भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करके छवि सुधारने का प्रयास शुरू किया है।
शिवराज सरकार ने भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ वर्षों से लंबित अभियोजन स्वीकृति यानी मुकदमा चलाने की अनुमति देने की प्रक्रिया तेज कर दी है। पिछले तीन महीने में ही जांच एजेंसियों लोकायुक्त व आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने 205 केस में 358 अफसरों व कर्मचारियों के खिलाफ कोर्ट में चालान पेश कर दिया है, लेकिन इसमें कोई बड़ा अफसर शामिल नहीं है।
दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि इस साल जनवरी से 9 मई तक मात्र 75 प्रकरणों में 119 आरोपियों के खिलाफ सरकार ने मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी। कर्नाटक चुनाव के परिणाम के बाद जून महीने में ही यह आंकड़ा बढ़कर 175 हो गया था। साफ है कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार वाले चुनावी मुद्दे को कमजोर करने के लिए लंबित प्रकरणों में मुकदमा चलाने की अनुमतियां देने की प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ी, क्योंकि सरकार के पास ये केस 5 से ज्यादा साल से पेंडिंग थे। खास बात यह है कि इसमें एक भी आईएएस-आईपीएस अफसर का नहीं है। सरकार ने रिटायर्ड आईएएस अंजू सिंह बघेल के खिलाफ मुकदमा चलाने की स्वीकृति दी है, लेकिन आईएएस पवन जैन की फाइल को रोक दिया है।

इस उदाहरण से समझिए, कैसे बचाए जा रहे बड़े अफसर
रिटायर्ड IAS के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति, वह भी 5 साल बाद
आईएएस अफसर अंजू सिंह बघेल ने कटनी कलेक्टर रहते आदिवासी की 7.6 हेक्टेयर जमीन अपने बेटे अभिवेन्द्र सिंह के नाम कर दी थी। मामले में ईओडब्ल्यू ने सितंबर 2017 में बघेल के भ्रष्टाचार निवारण संशोधित अधिनियम के तहत केस दर्ज किया था। जांच में आरोप सिद्ध होने पर आर्थिक अपराध शाखा ने उनके खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट पेश करने के लिए राज्य सरकार से 2018 में मुकदमा चलाने की स्वीकृति मांगी थी। लंबे इंतजार के बाद सरकार ने इसी साल 8 मई को कोर्ट में चालान पेश करने की अनुमति दी है।

अब पढ़िए, चार कलेक्टर, बड़े अफसर की चालाकी से कैसे बच रहे
इंदौर के पीयूष जैन और भरत बामने की 2013 में की गई शिकायत पर लोकायुक्त ने 22 जुलाई 2015 को 5 आईएएस अफसरों शिवशेखर शुक्ला (संस्कृति-पर्यटन विभाग में पीएस), अजातशत्रु श्रीवास्तव, बीएम शर्मा और कवींद्र कियावत सहित 16 लोगों के खिलाफ प्राथमिक जांच (पीई) दर्ज की थी। आरोप था कि उज्जैन के दताना गांव में एयरस्ट्रिप को विकसित करने, उसके रखरखाव और इस्तेमाल का काम 2006 में सात साल के लिए यश एयरवेज को दिया गया था। बाद में इस कंपनी का नाम बदलकर सेंटर एविएशन एकेडमी किया गया।
इस कंपनी ने नौ साल तक न तो लीज चुकाई और न ही इस दौरान उज्जैन में पदस्थ रहे कलेक्टरों ने इस पर ध्यान दिया। इस दौरान पीडब्ल्यूडी ने एयरस्ट्रिप के रखरखाव पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि यह खर्च कंपनी को करना था। इसकी जांच के बाद लोकायुक्त ने 2019 में एफआईआर दर्ज की। इसमें कहा गया कि 2006 से 2013 के बीच यश एयरवेज और दताना-मताना हवाई पट्टी पर खड़े होने वाले अन्य विमानों से किराया ही वसूल नहीं किया।
कियावत ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, तो सरकार का जवाब- भ्रष्टाचार नहीं हुआ
इस मामले में एक आरोपी कवींद्र कियावत ने एफआईआर रद्द करने की याचिका दायर की थी। कियावत 7 जुलाई 2014 से 27 जुलाई 2016 तक उज्जैन कलेक्टर रहे। कोर्ट ने जांच एजेंसी को जल्द से जल्द जांच पूरी करने को कहा था, लेकिन सरकार की तरफ से लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी ने कोर्ट में हलफनामा दिया कि कोई भ्रष्टाचार या घोटाला नहीं हुआ है।
तब लोकायुक्त ने मुखर्जी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की
लोकायुक्त ने फरवरी 2023 में सीनियर आईएएस अफसर अनिरुद्ध मुखर्जी के खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश की है। आरोप था कि उन्होंने उज्जैन के दताना एयरस्ट्रिप मामले में रिटायर्ड आईएएस कवींद्र कियावत की याचिका पर हाईकोर्ट में सरकार के हितों की अनदेखी करते हुए जवाब दाखिल किया था। इससे जांच एजेंसी का काम प्रभावित हुआ। इतना ही नहीं लोकायुक्त ने राज्यपाल मंगुभाई छगनभाई पटेल को पत्र भी लिखा है। इसके बाद यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। बता दें कि कवींद्र कियावत, बीएम शर्मा और अजातशत्रु श्रीवास्तव रिटायर हो चुके हैं।
3 आईएएस अफसरों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति की फाइल हो रही तैयार
मंत्रालय सूत्रों ने बताया कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भ्रष्टाचार में फंसे अफसरों के खिलाफ एक्शन लेने के निर्देश के बाद सामान्य प्रशासन विभाग आईएएस अफसर नियाज अहमद, लोकेश कुमार जांगिड़, पूर्व आईएएस सभाजीत यादव की फाइल तैयार कर रहा है। माना जा रहा है कि जल्दी ही केंद्र सरकार को प्रकरण भेज कर अनुमति ली जाएगी।

ये अफसर हैं जांच के दायरे में
आरडी अहिरवार, आरके गुप्ता, सीबी सिंह, ओआर तिवारी, रमेश थेटे, अखिलेश श्रीवास्तव, प्रकाश जांगरे, एनबीएस राजपूत, विनोद शर्मा, वेदप्रकाश, प्रमोद अग्रवाल, विवेक पोरवाल, निसार अहमद, मुक्तेश वार्ष्णेय, अरुण तोमर, डॉ. जे विजय कुमार, पीएल सोलंकी, मनीष श्रीवास्तव, अशोक शाह, प्रवीण अढायच, गोपाल चंद्र डाढ, एमसी चौधरी, रजनीश श्रीवास्तव, मनोज पुष्प, मनु श्रीवास्तव, अविनाश लवानिया, मुकेश शुक्ल, एनएस परमार, अरुणा शर्मा, उर्मिला शुक्ला, आरपी मंडल, एम कुजूर, डीपी तिवारी, सत्यप्रकाश वर्मा, अशोक वर्मा, एमए खान, महेंद्र सिंह भिलाला, लक्ष्मीकांत द्विवेदी, स्वतंत्र कुमार सिंह, श्रीनवास शर्मा, विनोद कुमार शर्मा, शीलेंद्र सिंह, राधेश्याम जुलानिया, वीरेंद्र सिंह, बसंत कुर्रे, एमके अग्रवाल, राकेश मोहन त्रिपाठी, रविन्द्र कुमार चौधरी व सपना निगम शामिल है।
कब से चल रही जांच
सीएम ने लिखित उत्तर में बताया है कि लोकायुक्त में वर्ष 2014 में आईएएस अफसरों के खिलाफ दो प्रकरण दर्ज हुए थे, उनकी जांच चल रही है। इसी तरह वर्ष 2015 में भी आईएएस अफसरों के खिलाफ दो प्रकरण दर्ज हुए थे, उनकी भी जांच चल रही है। इसी तरह वर्ष 2016 में चार प्रकरण जांच में हैं। वर्ष 2017 के तीन प्रकरण जांच में हैं। वर्ष 2018 और 2019 में एक-एक प्रकरण आईएएस अफसर पर दर्ज हुए इनमें भी जांच और विवेचना चल रही है। इसी तरह, वर्ष 2020 में चार प्रकरण, वर्ष 2021 में सात, वर्ष 2022 में 16 और इस साल एक प्रकरण आईएएस अफसर के खिलाफ जांच और विवेचना चल रही है।

15 जून तक दिया था अल्टीमेटम, अब सीएम खुद कर रहे मॉनिटरिंग
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मई महीने में अभियोजन स्वीकृति के प्रकरणों की विभागवार समीक्षा की। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा था कि विभिन्न विभागों में भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों पर तुंरत कार्रवाई की जाए। जहां प्रक्रिया पूर्ण हो गई है, दोषियों के विरूद्ध सख्त कदम उठाए जाएं। उन्होंने भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई के लिए 15 जून तक अल्टीमेटम भी दिया था। इसके बाद से मुख्यमंत्री स्वयं विभागों द्वारा की गई कार्रवाई की मॉनिटरिंग कर रहे हैं।
पंचायत विभाग में सबसे अधिक 23 मामलों में अभियोजन मंजूर
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में सर्वाधिक 23 प्रकरणों में अभियोजन की स्वीकृति दी गई है। इसके अलावा, राजस्व में 12, नगरीय विकास एवं आवास में 9, स्वास्थ्य में 8, गृह और कृषि विभाग में 6-6 और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग में 4 प्रकरणों में मंजूरी दी गई है।

193 केस में अभियोजन स्वीकृति लंबित
मंत्रालय सूत्रों ने बताया कि भ्रष्टाचार के आरोपी 193 प्रकरणों में अभियोजन की स्वीकृति लंबित है। इसमें सबसे ज्यादा सामान्य प्रशासन व पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के 50 केस हैं। इनमें से 12 अफसर ऐसे हैं, जिनकी अभियोजन की स्वीकृति 2018 से लंंबित हैं। इसी तरह, नगरीय आवास एवं विकास के 30, राजस्व के 20 और स्वास्थ्य विभाग के 15 मामले लंबित हैं।

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