Another female constable of MP will become male | रतलाम में पदस्थ लेडी कॉन्स्टेबल बचपन से अपने आप को समझती थी पुरुष

भोपालएक घंटा पहलेलेखक: संतोष सिंह
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मध्यप्रदेश की एक और महिला आरक्षक पुरुष बनेगी। गृह विभाग ने उसे जेंडर चेंज कराने की अनुमति इस शर्त के साथ दी है कि आगे उन्हें महिला संबंधी कोई लाभ नहीं मिलेगा। प्रदेश में यह दूसरा मामला है। इससे पहले निवाड़ी में पदस्थ एक महिला आरक्षक ने जेंडर चेंज कराया था।
सरकारी नौकरी में रहते हुए जेंडर चेंज कराने का देश में इस तरह का ये चौथा केस है। देश में सबसे पहले मुंबई की एक महिला आरक्षक ने जेंडर चेंज कराया था। इसके बाद यूपी की महिला आरक्षक ने अपनी पहचान बदली थी। रतलाम जिले में पदस्थ ये आरक्षक जेंडर चेंज कराने वाली प्रदेश की दूसरी और देश की चौथी महिलाकर्मी होगी।
महिला कॉन्स्टेबल दीपिका कोठारी ने जनवरी 2023 को जेंडर चेंज कराने की अनुमति सरकार से मांगी थी। उसे बचपन से ही जेंडर आइडेंटिटी डिसऑर्डर है। इसका मतलब है ये है कि उसका शरीर महिला है, लेकिन वो अपने आप को पुरुष समझती है। इसकी पुष्टि दिल्ली के मनो चिकित्सक डॉ. राजीव शर्मा भी कर चुके हैं। उन्होंने ही उसे जेंडर चेंज कराने की सलाह दी थी। इसे लेकर जिला मेडिकल बोर्ड से परीक्षण भी कराया जा चुका है। इसकी रिपोर्ट भी गृह मंत्रालय को 20 अप्रैल 2023 को मिल चुकी थी।
दीपिका ने 20 सितंबर 2021 को केंद्र सरकार के राजपत्र सहित निवाड़ी जिले में पदस्थ रही आरती यादव के जेंडर परिवर्तन की एनओसी भी अपने एफिडेविट के साथ पेश की थी। आरती को 1 दिसंबर 2021 को जेंडर परिवर्तन की अनुमति दी गई थी।
प्रदेश में जेंडर परिवर्तन के लिए कोई गाइडलाइन नहीं
प्रदेश में अभी जेंडर परिवर्तन के लिए कोई स्पष्ट नियम या गाइडलाइन नहीं है। इस कारण सरकार ने इस मामले में विधिक राय मांगी थी। विधिक राय में बताया गया कि प्रशासकीय विभाग अपने स्तर पर निर्णय ले सकता है। लिंग परिवर्तन अनुमति के संबंध में सुप्रीम कोर्ट पूर्व में निर्णय दे चुका है। इसमें कहा गया है कि जेंडर चेंज कराना किसी का व्यक्तिगत निर्णय है। प्रशासकीय विभाग इस बात पर विचार कर सकता है कि यदि नौकरी महिला होने के आधार पर मिली है, तो जेंडर चेंज कराने के बाद उसे महिला के तौर पर मिलने वाली सभी सुविधाओं से वंचित कर दिया जा सकता है।
गृह विभाग ने 14 अगस्त को विधिक सलाह के आधार पर महिला आरक्षक दीपिका कोठारी को जेंडर चेंज कराने की अनुमति प्रदान कर दी है। दैनिक भास्कर ने दीपिका से जेंडर चेंज कराने के मसले पर बात कर उनका पक्ष लेने की कोशिश की। दीपिका ने बताया कि मुझे खुशी है कि अनुमति मिल गई है, लेकिन इस पर अपने अधिकारियों की मंजूरी लेकर ही कोई बात कर पाऊंगी।

जेंडर चेंज कराने वाली प्रदेश की पहली आरक्षक निवाड़ी की थी
प्रदेश में सबसे पहले जेंडर चेंज कराने वाली महिला आरक्षक निवाड़ी जिले की थी। उन्होंने 2019 में जेंडर चेंज कराने का आवेदन दिया था, लेकिन इसकी अनुमति मिलने में दो साल लग गए थे। दरअसल, इस महिला आरक्षक में शुरू से ही सारे लक्षण पुरुषों जैसे ही थे। इसके बाद डॉक्टरों की सलाह पर उसने जेंडर चेंज कराकर पुरुष बनने का निर्णय लिया था। गांधी मेडिकल कॉलेज, दिल्ली और ग्वालियर के जयारोग्य चिकित्सालय के डॉक्टरों से उसने सलाह ली थी।

प्रदेश की दोनों आरक्षकों के जेंडर परिवर्तन में ये हुआ
पुलिस विभाग ने आवेदन पर पहले जिलों में छानबीन करवाई। महिला आरक्षकों के रिश्तेदार, परिजन और मित्रों से बात की गई। विधि विभाग से परामर्श लिया गया। सभी जगह से संतुष्ट होने के बाद गृह विभाग ने जेंडर चेंज करवाने की अनुमति दी।
क्या होता है आइडेंटिटी डिसऑर्डर या जेंडर डायसोफोरिया
मनोचिकित्सक डॉ. रक्षा साहू ने बताया कि आइडेंटिटी डिसऑर्डर या जेंडर डायसोफोरिया होने पर एक लड़का, लड़की की तरह, एक लड़की, लड़के की तरह व्यवहार करती हैं। दोनों ही अपोजिट जेंडर के अनुसार अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। दोनों ही अपोजिट बर्ताव में खुद को ज्यादा सहज महसूस करते हैं।
कब से दिखने लगते हैं इसके लक्षण
आइडेंटिटी डिसऑर्डर या जेंडर डायसोफोरिया के लक्षण बचपन से ही दिखना शुरू हो जाते हैं, लेकिन ज्यादातर रिपोर्ट में यह सामने आया है कि इन आदतों को 10-12 साल के बच्चों में आसानी से देखा जा सकता है। अगर वह आइडेंटिटी डिसऑर्डर या जेंडर डायसोफोरिया से ग्रसित है, जैसे कोई पुरुष है तो वह महिलाओं की तरह कपड़े पहनना, मेकअप करना और इशारे करता है। वहीं महिला पुरुष की तरह आचरण करती है।
ऑपरेशन के बाद क्या बदलाव आते हैं
कुछ लोग इस सर्जरी के बाद बेडरूम लाइफ को लेकर चिंता करते हैं, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे परेशानी होगी। ऑपरेशन के बाद लोगों की बेडरूम लाइफ भी पहले की तरह सामान्य होती है। पुरुष से महिला बनने वाले मां तो नहीं बन सकते, लेकिन सरोगेसी या बच्चा गोद ले सकते हैं। ऑपरेशन के बाद कम से कम एक साल तक हार्मोनल थैरेपी लेनी पड़ती है। कई बार पूरी जिंदगी भी हार्मोनल थैरेपी लेने की जरूरत पड़ती है। महिला से पुरुष बने लोगों को जीवन भर हार्मोनल थैरेपी लेनी पड़ती है।

ऐसे होती है जेंडर चेंज सर्जरी
सबसे पहले डॉक्टर एक मानसिक टेस्ट कराते हैं। इसके बाद इलाज के लिए हार्मोन थैरेपी शुरू की जाती है। जिस लड़के को लड़की वाले हार्मोन की जरूरत है वो इंजेक्शन और दवाओं के जरिए उसके शरीर में पहुंचाया जाता है। इस इंजेक्शन के करीब तीन से चार डोज देने के बाद बॉडी में हार्मोनल बदलाव होने लगते हैं। फिर इसका प्रोसिजर शुरू किया जाता है।
इसमें पुरुष या महिला के प्राइवेट पार्ट और चेहरे के शेप को बदला जाता है। महिला से पुरुष बनने वाले में पहले ब्रेस्ट को हटाया जाता है और पुरुष का प्राइवेट पार्ट को डेवलप किया जाता है।
पुरुष से महिला बनने वाले व्यक्ति में उसके शरीर से लिए गए मांस से ही महिला के अंग बना दिए जाते हैं। इसमें ब्रेस्ट और प्राइवेट पार्ट शामिल होता है। ब्रेस्ट के लिए अलग से तीन से चार घंटे की सर्जरी करनी पड़ती है।ये सर्जरी चार से पांच महीने के गैप के बाद ही की जाती हैं। इसमें संबंधित व्यक्ति के जेंडर के साथ ही उसके चेहरे, बाल, नाखून, हाव-भाव, हार्मोन, कान के शेप तक को बदल दिया जाता है।
जेंडर चेंज सर्जरी की पूरी प्रक्रिया में कम से चार डॉक्टर, मनोरोग विशेषज्ञ, सर्जन, गायनाकोलॉजिस्ट और एक न्यूरो सर्जन मौजूद रहता है। डॉक्टर बताते हैं कि ये सर्जरी 21 साल से अधिक उम्र के लोगों पर ही की जाती है। इससे कम उम्र में माता-पिता की ओर से लिखित में सहमति लेने के बाद ही ऑपरेशन किया जाता है।
अब जानिए नालसा जजमेंट से कैसे बदलवा सकते हैं दस्तावेजों में नाम
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) जजमेंट के बाद केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर पर्सन एक्ट 2019 पारित किया। इसमें ट्रांसजेंडर लोगों को ‘तीसरे लिंग’ के रूप में मान्यता दी गई। एक ट्रांसजेंडर वह व्यक्ति है, जो जन्म के समय जिस जेंडर (पुरुष या स्त्री) में पैदा हुआ, वह अपनी पहचान उस से अलग मानते हैं। यानी ट्रांसमैन वह व्यक्ति है, जिसकी जन्म के समय पहचान स्त्री के रूप में हुई, लेकिन अब वह खुद को पुरुष समझता है। इस एक्ट के माध्यम से ये लोग अपने मार्कशीट, डिग्री में अपना नाम बदलवा सकते हैं।
केरल-तमिलनाडु में सरकारी अस्पतालों, बाकी राज्यों में प्राइवेट में ही होती है सर्जरी
सेक्स रीअसाइनमेंट (एसआरएस) सर्जरी भारत के हर राज्य के सरकारी अस्पताल में नहीं होती है। केरल और तमिलनाडु में सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर इसे कर सकते हैं, लेकिन अन्य राज्य में यह प्राइवेट क्लीनिक में करवाई जाती है। इसमें लाखों रुपए खर्च आता है।
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