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छतरपुर जेल में कैदियों को अपराध की दुनिया से बाहर लाने मुनिश्री के प्रवचन: दुनिया सन्तो से मिलने आती है, आज के दिन सन्त आपसे मिलने आए है- मुनिश्री विरंजन सागर

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गुरु दक्षिणा में यदि कुछ देना है तो अपनी बुराईयों का त्याग कर दे दो – 

छतरपुर। पूज्य जनसन्त विरंजन साग़र जी महाराज ससंघ का आज छतरपुर जिला जेल में आगमन हुआ। उनकी आगवानी जेल अधीक्षक केके कुलश्रेष्ठ, जेलर रामशिरोमणि पांडेय ने की । जेल अधीक्षक और जेलर के आग्रह एवम सार्थक प्रयास से पुज्य मुनि श्री के प्रवचन जिला कारागार में हुए। इस अवसर पर जैन समाज के धर्मावलंबियो की भी मौजूदगी रही । जब पूज्य मुनि श्री ने अपना उद्बोधन दिया तो बंदियों की आंखे करुणा से भर गयी। महाराज श्री ने कहा दुनिया सन्तो से मिलने आती है, आज के दिन सन्त आपसे मिलने आए है। उन्होंने कहा की वह जगह कैसे खराब हो सकती है जिस जगह संतों के चरण पढ़े हो। वह जगह तो जेल नहीं जिनालय हो जाते हैं। छतरपुर जिला कारावास में बंदियों को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि आज के दिन आप और मैं दोनों कारावास में हैं अंतर बस केवल है आपको लाया गया है लेकिन मुझे बुलवाया गया है।

राम हनुमान से मिले थे उसी तरह मिलने आया हूं*

उन्होंने कहा कि मैं ठीक उसी तरह से मिलने आया हूं जैसे श्री राम प्रभु हनुमान से मिले थे और श्री कृष्ण सुदामा से मिले थे करुणामयी वचनों को सुन वातावरण भाव विभोर था । जहां पुरुष बंदियों की आंखें नम हो गई वहीं महिला बंदियों की आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ी।

मुनि श्री ने कहा कि जिस स्थान को संतों के चरणों की आशीष प्राप्त हो वह स्थान तो तीर्थ के समान है। आगे बोलते हुए कहा आज इस स्थान पर संत भी हैं, जेलर भी हैं,सिपाही भी हैं। उन्होंने सन्त औऱ सिपाही में अंतर बताते हुए कहा कि सिपाही तो आपको प्रहार के द्वारा समझाता है, और संत प्यार से समझाता है।लेकिन संत और सिपाही का मात्र उद्देश्य एक ही होता है। सिपाही दनादन करते हैं लेकिन संत तो परिवर्तन कर देते हैं। उन्होंने कहा हर आदमी में परमात्मा बनने की शक्ति विद्यमान होती है चाहे वह नन्हीं चींटी ही क्यों ना हो उन्होंने जोर देते हुए कहा जब नन्ही चींटी अपना कल्याण कर पाती है तो हम क्यों नहीं? ,सीख देते हुए कहा जो हुआ है उसे भूल जाइए, यह सब पाप कर्म के उदय से हुआ है। और अपनी जिंदगी को सुधार कर अच्छा जीवन जिये। 

इसीलिए यह जेल नहीं सुधार ग्रह है। जिस दिन मानव का मन परिवर्तन की राह पर आ जाता है उस दिन मानव को परमात्मा भी स्वीकार कर लेता है। जिस कारावास में णमोकार महामंत्र की ध्वनि गुंजायमान होती हो, सन्तो के आशीष चरण पढ़ते रहते हों, संतो के चरण आपके आचरण कैसे ना बदलेंगे। मैं सिर्फ जैन समाज को धर्म राह नहीं दिखाना चाहता बल्कि समाज और राष्ट्र के हितों की बात पहले पसंद करता हूँ, जब राष्ट्र सुरक्षित होगा तभी धर्म सुरक्षित होगा।

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