देश/विदेश

RIP शरद यादव- बेहद सहज, लेकिन उतने ही तेवर वाले नेता के तौर पर याद रहेंगे

हाइलाइट्स

लालू प्रसाद यादव को CM बनवाने में बड़ी भूमिका थी, लालू को हराया भी
कम नेता हैं, जो तीन अलग-अलग राज्यों चुनाव जीते हों
चरण सिंह के कहने से अमेठी में भी चुनौती दी थी

कोई पत्रकार अगर बीस पच्चीस साल के दौर में सबसे आसानी से उपलब्ध होने वाले 5 मंत्रियों की सूची बनाए तो शरद यादव का नाम उसमें होगा ही. बहुत ही सहजता से मिलते थे. खबरें भी उतनी ही आसानी से बता देते थे. काठमांडू से हाई जैक किए गए एयर इंडिया के विमान आईसी-814 का एक प्रसंग याद आता है. वही प्लेन हाई जैक, जिसे अपहर्ता कंधार ले कर गए थे. 31 दिसंबर को बंधक यात्री दिल्ली लौटे थे. उस वक्त वे नागरिक उड्डयन महकमे के मंत्री थे. मेरे समेत बहुत सारे पत्रकार एयरपोर्ट पहुंच गए थे. वहां पुलिस की भारी भरकम व्यवस्था थी. दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने खुद मोर्चा संभाल रखा था. पत्रकारों को अंदर नहीं जाने दे रहे थे. कमिश्नर से आग्रह किया कि मंत्री जी से पूछ लीजिए अगर बुलाएं तो हमें बताइगा, नहीं तो हम चले जाएंगे. कमिश्नर ने जैसे ही बताया, शरद जी खुद, कमरा या लाउंज याद नहीं आ रहा है, उसके गेट तक आए और इशारा करके बुला लिया. उस वक्त हम जो भी एक साथ थे, कोई वरिष्ठ कहे जाने वाले पत्रकार नहीं थे.

इस घटना का जिक्र इस कारण किया, क्योंकि उस वक्त भी दिल्ली में बहुप्रसारित अंग्रेजी और राष्ट्रीय कहे जाने वाले अखबारों के पत्रकारों को ही मंत्री लोग पहले सूचनाएं दिया करते थे. एक बार संपर्क बन गया तो हमेशा के लिए बनाए रखा. जब भी कोई आयोजन करते रहे निमंत्रण भिजवाने के साथ फोन भी किया करते थे. अब लगता है कि ये सहजता ही उनके लंबे संघर्ष और फिर सफलता की कुंजी रही होगी. बाकी जरूरी राजनीतिक चातुर्य तो अनिवार्य है ही. उन्हें ये भी पता था, कि जिस तरह की राजनीतिक धारा का वे प्रतिनिधित्व कर रहे हैं वो कहां और किन प्रदेशों में सफल हो सकती है. तभी उन्होंने मध्य प्रदेश, छोड़ उत्तर प्रदेश और बिहार में अपनी जमीन बना ली. पहली नजर में ये भी लगता है कि बिहार में लालू प्रसाद यादव का बोलबाला था, इसका फायदा लेने शरद यादव वहां गए. लेकिन ऐसा सोचते समय, ये भी ध्यान रखना चाहिए कि शरद यादव ने लालू प्रसाद यादव को मधेपुरा में लोकसभा चुनाव में हराया भी था.

हां, ये जरूर एक तथ्य है कि लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री बनाने में शरद यादव की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी. मंडल के मसीहा बनने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह किसी और को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे. वे शरद यादव ही थे, जिन्होंने ऐसी भूमिका तैयार की, जिसके जरिए लालू यादव बिहार में मुख्यमंत्री बन सके. बात यहीं खत्म नहीं हो गई, बल्कि जब लालकृष्ण आडवाणी की रथ-यात्रा के बाद बिहार सरकार गिर गई तो उस समय भी उन्होंने सरकार बचाने में भी लालू प्रसाद यादव की मदद की थी.

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जबलपुर से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा
शरद यादव ने जबलपुर में छात्र राजनीति से शुरुआत की थी. हालांकि ये भी रोचक है कि वे खुद इंजीनियरिंग के छात्र थे. वो भी मेधावी. गोल्ड मेडल भी हासिल किया था. मीसा कानून में जेल भी गए थे. उसी समय जयप्रकाश नारायण की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने विपक्ष के साझा उम्मीदवार के तौर पर उन्हें 1974 के जबलपुर लोकसभा उपचुनाव में प्रत्याशी बनाया. ये सीट उस दौर के दिग्गज कांग्रेस नेता सेठ गोविंद दास के निधन से खाली हुई थी. आजादी के बाद से लगातार कांग्रेस इस सीट को जीत रही थी. जेपी ने आवाज दी और शरद यादव ने उपचुनाव में सेठ गोविंद दास के बेटे रविमोहन दास को हरा दिया.

इंदिरा गांधी को चुनौती
जबलपुर से उपचुनाव में अपने प्रत्याशी के हारने और उस वक्त अपने विरोध में जा रहे जेपी के कैंडिडेट की जीत से इंदिरा गांधी को झटका लगा था. जबकि साझा उम्मीदवार की जीत को जय प्रकाश नारायण ने अपने प्रयोग की सफलता माना था. ये भी कहा जाता है कि बाद में जनता पार्टी का निर्माण इसी प्रयोग से हुआ था. हालांकि साल भर में ही लोक सभा का कार्यकाल मनमाने ढंग से बढ़ाए जाने के विरोध में उन्होंने जेल से ही इस्तीफा दे दिया. फिर अगला चुनाव 1977 में वे जबलपुर से ही जीत गए.

फिर राजीव गांधी से मुकाबला
इसके बाद शरद यादव को चरण सिंह ने अमेठी सीट से उतार दिया. भाई संजय गांधी के निधन के बाद उप चुनाव में राजीव गांधी कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर यहां से लड़ रहे थे. चौधरी साहब का मानना था कि अगर राजीव गांधी हार जाएं तो इंदिरा गांधी को बड़ा झटका दिया जा सकता है. बहरहाल, शरद यादव ये चुनाव नहीं जीत सके थे. इसके बाद शरद यादव बदायूं से 1989 में लोकसभा पहुंचे और विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में मंत्री बनाए गए.

चुनाव भी लड़े और संगठन भी चलाया
सरकार के साथ शरद यादव लगातार संगठन में सक्रिय रहे. 70 के दशक के अंतिम दौर से युवा लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर शुरु हुई संगठनात्मक यात्रा जनता दल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष, जनता दल के कार्यकारी अध्यक्ष, जनता दल के अध्यक्ष और फिर यूनाइटेड जनता दल के अध्यक्ष के तौर पर चलती रही. यानी दूसरे बहुत सारे नेताओं के उलट संगठन का कामकाज देखने के साथ जनता के बीच जाकर चुनाव भी लड़ते रहे. ऐसा उस दौर में भी कम ही हो रहा था. संगठन चलाने वाले नेता चुनाव लड़ने से कतराते थे. हालांकि शरद यादव भी अलग-अलग समय पर तीन बार राज्य सभा में चुने गए थे.

राजनीति किया, द्वेष नहीं
देश की आजादी से महज महीने भर पहले 1 जुलाई 1947 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में जन्मे शरद यादव ने जय प्रकाश नारायण से राजनीति सीखी थी. उन पर डॉ. राम मनोहर लोहिया का भी असर था. यही कारण है कि हर दल में उन्हें पसंद करने वाले नेता रहे. जनता दल को अगर समग्र रूप में देखा जाय तो गैरकांग्रेसी सभी नेता कभी न कभी उससे जुड़े रहे. सभी शरद यादव का सम्मान करते थे. ये शरद यादव का राजनीति चातुर्य ही था कि उन्हें न तो लालू के विरोध में लड़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई. हारने के बाद भी लालू प्रसाद यादव उनका बेहद सम्मान करते थे. नीतीश कुमार भी उसी तरह से उनका आदर करते रहे. दोनो ने उन्हें राज्य सभा केलिए अपनी पार्टियों का समर्थन दिया.

शरद यादव की राजनीतिक यात्रा आधी सदी की रही. इस दौरान वो 10 बार संसद सदस्य चुने गए. सात बार लोक सभा के लिए और तीन बार राज्य सभा के लिए. किसी एक चुनाव क्षेत्र को अपना बना कर नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के इस नेता ने वहां से तो चुनाव जीता ही, उत्तर प्रदेश और बिहार से भी चुनाव में जीत दर्ज की. लोकसभा में तीन अलग-अलग राज्यों का सफलतापूर्वक प्रतिनिधित्व करने वाले बहुत कम नेताओं के नाम याद आते हैं.

Tags: Jdu, JDU BJP Alliance, Parliament


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एडवोकेट अरविन्द जैन

संपादक, बुंदेलखंड समाचार अधिमान्य पत्रकार मध्यप्रदेश शासन

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